July 16, 2024 |

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यदि आप हमेशा अमीर बने रहना चाहते हैं तो इसे जरूर पढ़ें…

Sachchi Baten

सदाबहार अमीरी का रहस्य

(The Secret of Perpetual RICH)

 

आचार्य निरंजन सिन्हा

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समृद्ध बनना और सदाबहार अमीर बनना हर आदमी की नैसर्गिक (Natural) एवं समुचित (Proper) इच्छा भी है और स्वभाव भी है। यह हर मजदूर, किसान, विद्यार्थी, नौकरीपेशा, स्वरोजगार पेशा, गृहिणी, और मालिक का नैतिक, नैसर्गिक,और अनिवार्य अधिकार एवं स्वभाव ही है, तो इसे दिलाने मे हमें चाहिए कि सामान्य लोगों को सहयोग करें और प्रोत्साहन दें। हर आदमी को अस्तित्व में बने रहने के लिए उसके भौतिक अस्तित्व का बना रहना आवश्यक है। चूँकि आदमी का मूल स्वरूप भौतिक और मानसिक ही है, इसलिए उसके बने रहने के लिए उसे भौतिक पदार्थ की आवश्यकता है। इन सभी की पूर्ति धन (Money, Wealth) से ही होती है और इसके लिए उसे अमीर बनना या बने रहना अनिवार्य है।

परन्तु मुख्य सवाल यह है कि क्या धन कमा लेने या धन जमा कर लेने से आदमी अमीर बना रह सकता है? यदि ऐसा ही है तो कोई लॉटरी जीतने वाला व्यक्ति सदा अमीर क्यों नही बना रहता? क्योँकि वह अमीर बनने का या बने रहने का मूल बात (रहस्य) यानि उसके स्वभाव यानि उसके मनोविज्ञान को हीं जानता। अमीर बनना या बने रहना एक प्रक्रिया है, एक सोच है, एक मानसिकता है, एक मनोविज्ञान है, एक कौशल है और एक संस्कार है, जिसे समझना या और उसे सीखना पड़ता है। तो क्या धन जमा कर लेने पर अमीर बना नही रहा जा सकता? इसका स्पष्ट उत्तर है ‌- नहीं।

धन जमा रखने में आपको सरकार के नियंत्रण या प्रतिबन्ध सम्बन्धित कानूनों के अतिरिक्त आपको मुद्रास्फीति (Inflation) और अवमूल्यन (Devaluation) को भी समझना होता है। आप धन को नकदी में नहीं रख सकते क्योंकि मुद्रा स्फीति उस धन को खाता रहेगा, यानि क्षरित करता रहेगा, यानि नष्ट करता रहेगा (doing erosion) यानि उसे घटाता हुआ (Reducing) रहेगा।

तो आपको अमीर बनने या बने रहने के लिए आपको अपने धन को पूँजी (Capital) मे बदलना ही होगा। 

अमीर बनने या बने रहने के लिए यही एक वैधानिक (Legal) और उचित (Proper) तरीका है, जिसका कोई अन्य विकल्प नहीं है। ध्यान दें। फिर से दुहराता हूँ कि आपको अपने धन को पूँजी में बदलना होगा। 

पूँजी वह धन है, जो वस्तुओं या और सेवाओं के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उत्पादन करने के लिए प्रयुक्त होता है। जो धन उत्पादक नहीं, वह पूँजी नहीं हो सकता। अतः धन का निवेश उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं संचार की शक्तियों और साधनों में लगाना होता है और तब ही धन पूंजी बन पाता है। पूँजी से वस्तु या सेवा में या दोनों में मूल्य वृद्धि होती है। चूँकि पूँजी से लाभ होता है और इसिलिए पूँजी से लाभ में हिस्सा भी मिलता है। पूँजी से रोजगार बढ़ता है, उत्पादन बदता है, लोग शान्ति और समृद्धि के समर्थक बनते है। पूँजी से समृद्धि के विकास का चक्र शुरू होता है।

जो आदमी, समुदाय या राष्ट्र अपना धन को पूँजी में नहीं बदलता है, उस आदमी, समुदाय या राष्ट्र  का पतन होता है, वह गरीबी में रह्ता है, अशिक्षित रह्ता है। वह आदमी, समुदाय, या राष्ट्र कभी भी शान्ति और समृद्धि का समर्थक नहीं होता और वहां अशांति एवं  अराजकता पैदा होता है और वहां से पूँजी भी भाग जाती है। फिर निवेश घटता है, उत्पादन कम होता है, और रोजगार के अवसर में कटौती होती है। वहाँ अंधकार दिखता है। 

अत: इस बात पर भी ध्यान देना होता है कि क्या व्यक्ति, समाज या व्यवस्था का धन का निवेश उत्पादक कार्यों में हो रहा है या अनुत्पादक कार्यो में? अनुत्पादक कार्यों में धन का निवेश दिखावटी और धार्मिक कार्यों को करने में गिना जा सकता है।अपने परिवेश को देखिए और समझिए कि कौन से धन से प्रत्यक्ष उत्पादन और रोजगार बढाता है एवं किससे नहीं। जो धन प्रत्यक्ष उत्पादन और रोजगार बढ़ाता है, वही धन पूँजी है और वही आपके, आपके समुदाय और आपके राष्ट्र के लिए हितकारी है। बाकी कार्यों में कौन सी किस श्रेणी में आएगा, आप बेह्तर समझते हैं। आपको सजग (Conscious) एवं सतर्क (Alert) रहना होगा कि आपका धन पूँजी ही बने। शरीर की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए आवश्यक धन की खपत के बाद बचे धन को पूँजी बनाना ही समझदारी है। विकसित समाज और विकसित अर्थव्यवस्थाओं का यही अंदरूनी राज है।

हर व्यक्ति व्यवसाय नहीं कर सकता। अत: लोगों को निवेश करने के लिए पूँजी के बाज़ार में पूँजी लगानी होती है। इसके लिए बाज़ार में जॉइंट स्टॉक कम्पनियाँ होती है, जिसमें निवेश करने के लिए  स्टॉक एक्सचेंज होते है। इसे अधिकतर नगरीय लोग जानते हैं, परन्तु ग्रामीण लोगों को ध्यान में रख कर इसे थोड़ा विस्तार से बताना चाहूँगा। कम्पनी एक कल्पित वास्तविकता (Imaginary Reality) होती है, जो राज्य के विशेष नियम से निगमित (Incorporated) या स्थापित (Established) होता है। भारत में इसे कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत करते हैं, जो पहले कम्पनी अधिनियम, 1956 कहलाता था।

शेयर को हिन्दी में अंश (Share) कह्ते है और इसे धारण करने वाले को अंशधारक (Share Holder)। शेयर के बंडल को स्टॉक (Stock) कह्ते हैं। आप कोई शेयर किसी स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से खरीदते हैं। इस बाज़ार में निवेश करने वाले कुछ निवेशक रोते हुए भी मिल सकते हैं। ये वो लोग हैं, जो शेयर में निवेश शेयर के व्यापार (Trading) करने के लिए करते हैं अर्थात लगभग रोजाना खरीद बिक्री करते हैं यानि रोजाना की ट्रेडिंग करते हैं या उस पर ही ध्यान लगाए रखते हैं। इस तरह यह निवेश नहीं हुआ, बल्कि जुआ (Gamble) खेलना है और इसी कारण उनकी गति जुआ के खिलाड़ी जैसी ही हो जाती है। 

निवेश से कमाई यानि पूँजी से कमाई शेयर को अपने पास रख कर ही की जाती है, उसे खरीदने बेचने के व्यापार से नहीं।*   (इसे बार बार पढ़ें और मनन करें)।

समझदारी शेयर बेचने के समय से अधिक शेयर खरीदते वक्त दिखानी पड़ती है। अर्थात आपको उस कम्पनी के लाभांश यानि डिविडेन्ड पर ही ध्यान रख कर निवेश के लिए कम्पनी का चयन करना होगा। चूँकि निवेश बाज़ार के लिए और बाज़ार में होता है, इसी कारण कम्पनी के चयन में आपको बाज़ार की होने वाली माँगों (Demands) पर भी ध्यान रखना होता है। यह सब आपको पहली बार जटिल लग सकता है, पर यह धीरे धीरे आदत में विकसित होता है।

फिर भी यदि आपको यह समस्या लग रही है, तो आप डॉ. भीमराव आम्बेदकर का प्रसिद्ध सूत्र याद रख सकते है – *EDUCATE, *AGITATE, *ORGANIZE. यानि शिक्षित बनो,  मनन (मंथन) करो, और  संगठित करो। अर्थात आप पूँजी बाज़ार का अध्ययन कर उस क्षेत्र मे शिक्षित बनिए। उस अध्ययन का उस कम्पनी, उसके उत्पादों की माँगों, उससे सम्बन्धित बाज़ारों की शक्तियों इत्यादि के संदर्भ में मनन या मंथन यानि चिन्तन करें। फिर उसे व्यवस्थित करें। चूँकि आप अकेले हो सकते हैं, आपको कोई परामर्शदाता या गुरु (Mentor) नहीं मिला हो और आपको कुछ और समझना हो, तो आप किसी उसी तरह के संगठन में शामिल हो जाइये या उसी उद्देश्य के उसी मानसिकता के लोगों का संगठन बना लीजिए। आपको सफलता मिलनी ही है। निवेश के अन्य स्वरूप यथा जमीन, स्थायी सम्पत्ति, सोना या अन्य कीमती धातु या पत्थर, बाण्ड, सावधि जमा या दूसरे स्वरूपों की चर्चा यहां अभी नहीं की जा रही है।

एक और बात ध्यान में रखिए। कोई इतना नहीं कमाता है कि उसको बचत ही हो। बचत के लिए बचत का संस्कार (आदत) यानि मानसिकता विकसित करना पड़ती है। कोई सेवा, वस्तु या अन्य खर्च में निर्णय दिल से लेने की जगह दिमाग से लें। अर्थात भावनाओं (Emotion) की जगह विवेक (Wisdom) से काम लें, यह उलझन शुरुआती के कुछ समय के लिए ही रहती है और बाद मे यह सम्यक ढंग से विकसित हो जाता है। शुरुआती दौर में आपको विलासिता (Luxury) की वस्तुओं को खरीदने से बचना होगा, आपको मित्रों और पड़ोसियों की दिखावटी ठस्सों (Showy Exposure) से तुलना करने से भी बचना होगा।

बाद में यही लोग, आपके धन से ईर्ष्या करेंगे। वैसे वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने से बचिए, जिसको खरीदने से फिलहाल टाल सकते हैं। “टालना” धन के मामले में सर्वथा उचित है, जबकि “टालना” पूंजी के मामले में सर्वथा अनुचित है। अपने व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए अपने आप को धन दीजिए, यह आप में निवेश है और इसी कारण यह धन पूँजी है। वैसे शिक्षा और स्वास्थ्य सदैव निवेश की प्राथमिकता में शामिल किया जाना चाहिए। आपको धन के मामलों में जनप्रिय नहीं बनना है। और आपका धन आपका है, कोई आपको ऐसे ही धर्मार्थ में नहीं दिया है। इसलिए अपने धन को उत्पादक बनाईये, अपने धन को पूँजी बनाईये। व्यवस्था की मजबूरी होती है, या दिखावटी चिंता होती है और इसी कारण वह धन को पूंजी नहीं बनाता। इसीलिए वह शिक्षण संस्थानों के बदले धार्मिक संस्थाओं में धन खपाता है।

यदि आपका धन नहीं बचता है, तो भी आप अपने आय का 10 से 20 प्रतिशत तक खर्च करने से पहले ही हटा लीजिए। यह भी मान लीजिए कि आपकी आय ही उतनी कम है, जितना धन आपके हटा लेने के बाद बचता है। बचत की आदत डालिए, शुरू में यह कष्टकर है, फिर आदत बन जाएगी। यदि आप व्यक्ति के रूप कमाई करते हैं, तो आपके खाते में जितनी राशि आती है, सरकार आपकी आय का तीस प्रतिशत से अधिक राशि तक आयकर के रूप में ले सकती है। लेकिन पूँजी से होने वाली आय पर आयकर नहीं लेगी या लेगी भी तो न्यून दर पर। उन कम्पनियों को सारे खर्च कर काटने के बाद बची आय पर भी पचीस प्रतिशत से कम ही आयकर देना होता है, जिन कम्पनियों में आपने अपना पूँजी का निवेश किया है। तो क्यों नहीं आप भी इस सुविधा का लाभ उठाएं?

अमीर बनने का या बने रहने का कोई और दूसरा वैधानिक रास्ता नहीं है। दुनिया में जितने भी अमीर हैं, इसी तरीके से अमीर बनें है या बने हुए हैं।

आप शुरू तो कीजिए। नाधा तो आधाआधा तो साधा। अर्थात आपने शुरू कर दिया, तो उसी समय आपने आधा सफर तय कर लिया। फिर, इसका बार बार अध्ययन कीजिये। फिर खूब मनन कीजिये, मंथन कीजिए और उसे व्यवस्थित तथा संगठित कीजिए। आइए, शुरू करें और अमीर बने।

 

(लेखक राज्य कर विभाग पटना बिहार से संयुक्त आयुक्त पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त हैं। आप इनके अन्य आलेख नीचे के लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।)

www niranjansinha.com


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