July 24, 2024 |

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यदि आप शासन या व्यवस्था पर नियंत्रण या प्रभाव चाहते हैं तो इसे जरूर पढ़ें

Sachchi Baten

कथानक ही शासन करता है

 (The Narrative itself Rules)

आचार्य निरंजन सिन्हा 


चूंकि कथानक (Narrative) ही शासन करता है, यानि कथानक ही व्यवस्था और शासन को संचालित, नियमित, नियंत्रित करता है और उसे प्रभावशाली बनाता हैं, इसीलिए इस महत्वपूर्ण और सार्थक अवधारणा (concept) को समझना और उसकी क्रियाविधि (mechanism) के साथ साथ उसके प्रभाव एवं प्रयोग की विधि को जानना समझना जरूरी होता है। इसी कारण इसे ध्यान से समझा जाय, यदि आप शासन या व्यवस्था पर नियंत्रण या प्रभाव चाहते हैं।

कथा एक छोटी कहानी (Story) होती है, जिसमें एक रचना अपनी अभिव्यक्ति में सम्पूर्णता (प्रारंभ से समापन तक) लिए होती है। जबकि एक कथानक एक सुस्पष्ट भाव या मंशा को लिए एक कथा स्वरूप में होती है, जिसे किसी स्पष्ट लक्ष्य या उद्देश्य के लिए संगत, सरल और बुद्धिग्राह्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। अतः एक कथानक यानि एक Narrative वह कहानी है, जिसमें व्यक्ति विशेष, घटनाओं और विचारों एवं आदर्शों को जोड़ते हुए उनका सूक्ष्म , विस्तृत, गहन और सुविचारित भावनात्मक ब्यौरा एवं  वर्णन होता है, जिसका उद्देश्य सामने वाले श्रोताओं को कथाकार अपनी मंजिल तक ले जाएं। इस तरह एक कथानक एक ऐसी वर्णनात्मक प्रसंग या कहानी होती है, जो भावनात्मक लहरें उत्पन्न कर श्रोताओं को बहाकर वहां ले जाती है, जहां उस कथानक का सृजनकर्ता अपने श्रोताओं को ले जाना चाहता है।

इस तरह एक कथा किसी भी कथ्यात्मक कृति का संरचनात्मक ढांचा (Structural Frame) मात्र होता है, जबकि एक  कथानक उस कथा के मूल संरचना पर आधारित किसी स्पष्ट और पूर्व निर्धारित लक्ष्य की ओर जनमानस को बहा ले जाने की भावना से प्रस्तुति होता है। स्पष्ट है कि एक कथानक वर्णनात्मक शैली में सरल, सहज और साधारण रूप में प्रस्तुत होगा एवं सभी के लिए बोधगम्य भी होगा। यह कथा स्वरुप से ज्यादा असरदार होता है और लक्ष्य को प्राप्त करने में अधिक कारगर साबित होता है। जहां एक कथा अपने वाचन में श्रोता को आने वाली अगली कड़ी (आगे क्या होगा) के लिए उत्सुकता जगाती हैं, वहीं एक कथानक अपने श्रोताओं को ‘क्यों’ और ‘कैसे’ आदि उत्सुकताओं को सम्हालता है और इसलिए एक कथाकार अपने श्रोताओं को बहा ले जाने में सक्षम और सफल भी होता है।

एक कथानक को तर्कसंगत कार्य -कारण अंत: संबंध पर आधारित दिखना होता है, यथार्थ एवं वास्तविकता की पूर्णता का आभास देता हुआ होना होता है, और विवेकशील यानि समाज और मानवता के लिए समुचित होने का झलक दिखलाना या झांसा देता हुआ (यानि झूठों का पुलिंदा) होना होता है। समेकित रूप में एक कथानक को वैज्ञानिकता से पूर्ण वास्तविक दिखना होता है। इतने तत्वों के संयोजन और समेकन से ही एक कथानक भावनापूर्ण उत्तेजना (धर्म अब ख़तरे में है) पैदा कर उसमें श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर अपने लक्ष्यों से सराबोर कर देता है। यह काल्पनिक होते हुए भी प्रभाव में वास्तविक होती है। एक कथानक अपने श्रोताओं को विचारों की जीवंतता प्रदान करता है।

कोई व्यवस्था या शासन या वर्ग या राष्ट्र कथानकों का उपयोग कर ही अपने विचार, आदर्श, मूल्य आदि का प्रचार प्रसार करता है और विरोधी को नुक़सान पहुंचाने (चीन विश्व में साम्यवाद फ़ैला देगा, मानों मानवता की बात मानवता के विरुद्ध होता है) में इसका प्रयोग उपयोग करता है। चूंकि इसमें भावनाओं को उभारने और बहा ले जाने की क्षमता होती है, इसीलिए यह ठोस तथ्यों और वास्तविकताओं के होने के बावजूद भी उस पर प्रभावी हो जाता है। कहा भी गया है कि दिमाग हमेशा दिल से हार जाता है, अर्थात तथ्य, तार्किकता एवं वैज्ञानिकता समेकित रूप में भी सदैव भावनाओं से हार जाता है। इसीलिए जनता को अपने पक्ष में करने के लिए मुद्दों को भावनात्मक बनाया जाता है और भावनात्मक रूप से प्रस्तुत भी किया जाता है। मानव अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी भावनात्मक बातों में भूल जाता है (जैसे धर्म के सामने गरीबी का प्रसंग निरर्थक हो जाता है) , यानि उसे भी प्राथमिकता नहीं देता है।

किसी की संस्कृति उसके इतिहास से निश्चित और निर्धारित होता है, जिस रूप में वह प्रस्तुत होता है। और इसीलिए संस्कृति में भावनात्मक मुद्दे उभारने की क्षमता और योग्यता होती हैं। संस्कृति में तथाकथित धर्म भी होता है, प्रजाति भी होता है, जाति यानि समुदाय भी होता है, परम्परा एवं रीति रिवाज भी होता है। इस संस्कृति में विशालता, व्यापकता और गहानता लिए विरासत भी होता है। इस तरह संस्कृति जड़ता (Inertia) पैदा करता है, यानि समाज और समुदाय की सापेक्षिक स्थिति में स्थिरता देता है। यानि यदि वह गतिमान है, तो गति की अवस्था बनाए रखेगी, और यदि वह स्थिर है, तो स्थिरता की अवस्था बनाए रखेगी। इसे ही “सांस्कृतिक जड़ता” (Cultural Inertia) कहते हैं। इसी सांस्कृतिक जड़ता के गुण विशेषताओं का उपयोग कथानक में किया जाता है, और तब यह कथानक भयानक भावनाओं का उभार भूखो और नंगों में भी कर देता है। धर्म यानि सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र एवं समुदाय आदि इसी कारण भावनात्मक सैलाब लाता है। इसे समझ कर इसका उपयोग दुरुपयोग किया जा सकता है। इसीलिए इतिहास को अपने अनुकूल बनाना पड़ता है। चूंकि सामान्य जन में आलोचनात्मक विश्लेषण और चिंतन नहीं होता है, इसलिए हर इतिहास उसके लिए प्रामाणिक और वैज्ञानिक होता है। इसीलिए इतिहास को बदलना पड़ता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रथम महिला एलिनोर रूज़वेल्ट (Eleanor Roosevelt), जो राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डि रूज़वेल्ट की पत्नी थी, ने एक बार कहा था – छोटे लोग यानि छोटे विचारक व्यक्तियों का वर्णन ज्यादा करते हैं, मध्यम दर्जें के लोग यानि विचारक घटनाओं का ब्यौरा ज्यादा देते हैं, और बड़े विचारक आदर्शों, सिद्धान्तों और मूल्यों की बात ज्यादा करते हैं। अर्थात यह बढ़ते हुए यानि चढ़ते हुए क्रम में Individual, Incidence, Ideas (3 I’s) के स्तर का निर्धारण करता है। तय है कि समाज में साधारण लोग ही अधिसंख्यक होते हैं और वे किसी व्यक्ति विशेष की चर्चा, यानि गुणगान एवं आलोचना में ही डूबे रहते हैं, और ऐसे लोग व्यक्ति वर्णन आधारित (जैसे मोहनलाल का तथाकथित कृतत्व) कथानक में आसानी से बहा लिए जाते हैं। समाज में मध्यम दर्जें के लोग अपेक्षाकृत बहुत कम होते हैं, और इसीलिए इनके मानसिक स्तर के अनुरूप इनको बहाने के लिए, यानि तैरने का अहसास दिलाने के लिए घटनाओं के “ब्यौरात्मक वर्णन” (Detailed Discription) की आवश्यकता होती है और ऐसी ही कथानक (जैसे कोई पुलिसिया या सैन्य कार्रवाई) बनानी पड़ती है। बड़े लोग यानि बड़े चिंतक एवं विचारक इस मानसिक स्तर के होते हैं कि किसी भी प्रकार की चटपटी कथानक उनकी आलोचनात्मक विश्लेषण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेकशील चिंतन के गर्मी में ठहर नहीं पाता और उसके वास्तविक प्रयोजन को जान लिया जाता है। एक शानदार कथानक बनाने में उपरोक्त स्तर और उनके मनोविज्ञान का ध्यान रखना पड़ता है।

हमें कथानक गढ़ने और उसकी क्रियाविधि को समझने के लिए Institute of Propaganda Analysis के अध्ययन का भी एक अवलोकन अवश्य किया जाना चाहिए। यह संस्था अमेरिका में द्वितीय विश्व युद्ध के समय स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रचारित और प्रसारित कथानकों यानि प्रोपेगैंडा (Propaganda) की वास्तविकता को समझने के लिए किया गया था। इसे आप सामान्य जन में आलोचनात्मक विश्लेषण और चिंतन विकसित करना कह सकते है, जिसकी आवश्यकता आज़ भारत को भी है। इसे समझ कर कोई अपने मन या लक्ष्य के अनुरूप कथानक तैयार कर सकता है। यह सभी को अपने पारिस्थितिकी, अपनी परिस्थितियों, और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कथानक को तैयार करने में सहायता करेगा। इसमें कथानक को प्रचारित और प्रसारित करने की सात तकनीक बताई गई है, जिसे 1. Name – Calling, 2. Glittering Generality, 3. Transfer, 4. Testimonial, 5. Plain Folks, 6. Card Stacking, and 7. Bandwagon के नाम से जाना जाता है। ‘वोल्गा मैया’ ने बुलाया है, ‘ बिरयानी’ की खुशबू ने पुकारा है, गरीबी को मिटाना है, धर्म ख़तरे में है (मानो इसके अनुयाई उनके ईश्वर से भी ज्यादा ताकतवर हो गए हैं और उनका ईश्वर धर्म बचाने सक्षम नहीं है), वह गया (नगर) गुजरा आदमी है (मानों गया एक अपवित्र नगर है और उससे गुजरने वाले निकृष्ट लोग हैं), आदि आदि कई कथानकों के उदाहरण हैं। जब आप इन सातों तकनीकों का ध्यान पूर्वक अध्ययन करेंगे तो आपको समझ में आएगा कि कुछ प्रभावशाली राजनीतिक समूह भी इसका प्रभावपूर्ण उपयोग या दुरुपयोग आज कर रहे हैं।

वही शासन करता है, या कर रहा है, जिसे कथानक यानि Narratives गढना आता है। यदि आपकों भी शासक बनना है, या शासक वर्ग बनना है, तो आप भी कथानक की अवधारणा और क्रियाविधि को समझिए। और विश्व व्यवस्था पर शासन कीजिए। समझने के लिए, हो सकता है, इसे एक से अधिक बार पढ़ना पड़े। अन्यथा आप शासक बनने के दौर में घिसटते रहेंगे।

 


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