July 23, 2024 |

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गांधी की फिर हत्या, इस बार बनारस मेंः पढ़िए राज्य सत्ता का शर्मनाक खेल

Sachchi Baten

मामला बनारस के सर्वसेवा संघ का

जिसके अंतिम शब्द हों ‘हे राम’, उससे बड़ा हिंदू कौन

-फिर भी हिंदूवादी गोडसे ने ही उनकी हत्या की, अब बापू के विचारों को मारने का प्रयास

-महात्मा गांधी के विचारों वाले साहित्य व उनकी फोटो को पुलिस से फेंकवाया

-बनारस के राजघाट स्थित परिसर को जबरन खाली कराया, विरोध करने वालों को किया गिरफ्तार

राजेश पटेल, बनारस  (सच्ची बातें)। जिस शख्स के मुंह से अंतिम समय में ‘हे राम’ निकला हो, उससे बड़ा हिंदू कौन हो सकता है ? लेकिन करीब 83 साल पहले दिल्ली के बिड़ला हाउस में उस शख्स की गोली मारकर हत्या एक हिंदूवादी ने ही की। उसका सबसा बड़ा दुश्मन हिंदूवादी संगठन ही बन गया था। आज भी वह संगठन दुश्मनी निभा रहा है। मरने के बाद से अब तक उनके विचारों पर लगातार हमला किया जा रहा है। कभी उनकी फोटो को गोली मारकर तो कभी उनके विचारों वाली किताबों का अनादर करके तो कभी और लांछन लगाकर। फिर भी वह व्यक्ति अपने विचारों के रूप में जिंदा है, और जब तक सूरज-चांद रहेगा, तब तक जिंदा रहेगा। समझ तो गए ही होंगे कि बात किसकी हो रही है। फिर भी लिखना जरूरी है। उस महान शख्सियत का नाम है मोहन दास करमचंद गांधी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और बापू।

22 जुलाई, 2023 अखिल भारत सर्व सेवा संघ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह संस्था महात्मा गांधी की विरासत को संभाले हुए है। इसका गठन एक हिंदू कट्टरपंथी द्वारा उनकी हत्या के तुरंत बाद किया गया था। इसी दिन देश ने राज्य सत्ता का सबसे शर्मनाक कृत्य देखा। पुलिस बल ने वाराणसी में सर्व सेवा संघ के परिसर में जबरन प्रवेश किया। दशकों से वहां रह रहे लोगों का सामान बाहर निकाल दिया। सर्व सेवा संघ प्रकाशन की हजारों किताबें और सामग्री बाहर फेंक दी गईं। फेंकी गई किताबों और सामग्रियों से महात्मा गांधी की प्रतिमा की तस्वीर उनके प्रति राज्य मशीनरी के घोर अनादर को दर्शाती है। बापू न केवल राष्ट्रपिता हैं, बल्कि दुनिया भर में सम्मानित एक सार्वभौमिक व्यक्तित्व भी हैं। राम धीरज, अरविंद अंजुम, नंदलाल मास्टर, चंदन पाल, ईश्वरचंद, अनोखे लाल, राजेंद्र मिश्रा और जितेंद्र सर्व सेवा संघ वाराणसी के परिसर को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर लिया।

जानिए अखिल भारत सर्व सेवा संघ के गौरवशाली इतिहास को

अखिल भारत सर्व सेवा संघ का गौरवशाली इतिहास एवं समृद्ध विरासत है। महात्मा गांधी अपने सपनों के वास्तविक स्वराज के लक्ष्य को साकार करने के लिए 2 फरवरी 1948 को सेवाग्राम में देश के विभिन्न क्षेत्रों में लगे रचनात्मक कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाना चाहते थे।  30 जनवरी 1948 को  ही उनकी हत्या कर दी गई। हालाँकि, प्रस्तावित सम्मेलन 11-15 मार्च 1948 को बाद हुआ।

इस सम्मेलन में सर्वोदय समाज और अखिल भारत सर्व सेवा संघ की स्थापना का प्रस्ताव बना। बैठक में गांधीवादी आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गजों सहित 47 लोगों ने भाग लिया। आचार्य विनोबा भावे, पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, डॉ. जाकिर हुसैन, जेसी कुमारप्पा, काकासाहेब कालेलकर, गुलजारीलाल नंदा, जयप्रकाश नारायण और अन्य उपस्थित थे। अखिल भारत चरखा संघ, अखिल भारत ग्राम उद्योग संघ, अखिल भारत गो सेवा संघ, हिंदुस्तानी तालिमी संघ और महरोगी सेवा मंडल के विलय के बाद अप्रैल 1948 में अखिल भारत सर्व सेवा संघ अस्तित्व में आया।

सर्व सेवा संघ की स्थापना वाराणसी में आचार्य विनोबा भावे, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री और अन्य जैसे दिग्गजों के प्रयासों और मार्गदर्शन से की गई थी। वास्तव में जब विनोबा भावे बिहार और उत्तर प्रदेश में यात्रा कर रहे थे तो उन्हें गांधी जी के संदेश को फैलाने के लिए सर्वोदय साहित्य के प्रचार-प्रसार की सख्त जरूरत महसूस हुई।

जेपी ने की थी गांधी विद्या संस्थान (गांधीवादी अध्ययन संस्थान) की स्थापना की थी

इस प्रकार सर्व सेवा संघ प्रकाशन, सर्व सेवा संघ की प्रकाशन शाखा की स्थापना 1955 में विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के दौरान की गई थी। इसी परिसर में एक अन्य लोकप्रिय गांधीवादी कार्यकर्ता, विचारक और समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण थे, जिन्होंने गांधीवादी विचार और आधुनिक सामाजिक विज्ञान को एक साथ लाने के लिए 1960 में गांधी विद्या संस्थान (गांधीवादी अध्ययन संस्थान) की स्थापना की थी।

जेपी ने किसी और को नहीं, बल्कि ईएफ शूमाकर को संस्थान का निदेशक बनने के लिए आमंत्रित किया। यह जेपी के भव्य दृष्टिकोण और संस्थान की पूर्व प्रतिष्ठित स्थिति को दर्शाता है। भारतीय सामाजिक विज्ञान और अनुसंधान परिषद (ICSSR), 1977 से संस्थान को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा था। यह विवाद 2003 के आसपास राजनीतिक कारणों से शुरू हुआ और अंततः संस्थान का पंजीकरण रद कर दिया गया।

साजिश कहां से, समझिए

15 मई, 2023 को संस्थान को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया और संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को दे दिया, जो कला के क्षेत्र में अनुसंधान केंद्र के रूप में काम करता है। इसके अध्यक्ष पत्रकार रामबहादुर राय हैं। रामबहादुर राय की राजनैतिक पृष्ठभूमि समझने के लिए यही काफी है- वह इस समय देश की सबसे पुरानी बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के संपादक हैं।

हाईकोर्ट ने डीएम को दिया स्वामित्व जांच करने का निर्देश

सरकार के बलपूर्वक अधिग्रहण ने सर्व सेवा संघ के परिसर को फैसले के विरोध में सत्याग्रह का मैदान बना दिया। जल्द ही सर्व सेवा संघ ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और 16 मई, 2023 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी के जिला मजिस्ट्रेट को सर्व सेवा संघ के भूमि रिकॉर्ड की जांच करने और संपत्ति के स्वामित्व का पता लगाने का निर्देश दिया, जो लगभग 12.90 एकड़ है।

जांच के बाद डीएम ने कहा जमीन रेलवे की

अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट को जमीन के स्वामित्व का पता लगाने के लिए दो महीने की समय सीमा दी। 29 मई, 2023 को वाराणसी के जिला मजिस्ट्रेट ने सुनवाई शुरू की। 26 जून, 2023 को उन्होंने एक आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया कि यह जमीन उत्तर रेलवे की है। 27 जून, 2023 को उत्तर रेलवे द्वारा संगठन के परिसर पर चिपकाए गए एक नोटिस में कहा गया है, “सभी अतिक्रमणकारियों को सूचित किया जाता है कि 26 जून, 2023 को जिला मजिस्ट्रेट, वाराणसी के एक नोटिस के क्रम में, रेलवे अधिकारी 30 जून को सुबह 9 बजे अवैध के खिलाफ विध्वंस की कार्रवाई करेंगे। आप सभी को परिसर खाली करने के लिए सूचित किया जाता है।”

28 जून, 2023 को सर्व सेवा संघ ने विध्वंस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और प्रार्थना की कि इसे रद कर दिया जाए। क्योंकि सोसायटी के पास भूमि पर अपना स्वामित्व साबित करने के लिए 1960, 1961 और 1970 के तीन भूमि विलेख हैं। 4 जुलाई, 2023 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी में ‘सर्व सेवा संघ’ के विध्वंस के आदेश के खिलाफ किसी भी राहत से इनकार कर दिया।

डिवीजन बेंच ने ‘अखिल भारत सर्व सेवा संघ और अन्य’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को निचली अदालत में जाना चाहिए। सर्व सेवा संघ ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सात जुलाई, 2023 को सुप्रीम कोर्ट वाराणसी के जिला मजिस्ट्रेट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गई, हालांकि कोई राहत नहीं मिली।

जमीन खरीद के दस्तावेज मौजूद, लेकिन कोई मतलब नहीं

रेलवे और अखिल भारत सर्व सेवा संघ के बीच बिक्री विलेख वर्ष 1960 में पंजीकृत किया गया था। यह समझौता 15 मई 1960 को भारत के राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में उत्तर रेलवे (लखनऊ) के डिविजनल इंजीनियर और संघ के ट्रस्टी राधाकृष्ण बाजा के बीच हुआ। दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि प्लॉट नं. रेलवे के 8, 9, 10, 11, 12 को कुल 23,490 रुपये की कीमत पर यानी 2700 प्रति एकड़ की दर से संघ को बेचा गया था। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि संपत्ति और अन्य वस्तुओं के मूल्य के लिए संघ द्वारा ट्रेजरी चालान संख्या 17 के अनुसार 26,730 रुपये भारतीय स्टेट बैंक में जमा किए गए थे।

विक्रय विलेख की शर्तों को देखिए

इस विक्रय पत्र में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि भूमि स्वामित्व का पूर्ण हस्तांतरण विक्रेता अर्थात रेलवे द्वारा अखिल भारतीय सर्व सेवा संघ को किया जा रहा है। और भविष्य में विक्रेता (रेलवे) द्वारा संपत्ति पर कोई दावा नहीं किया जाएगा और न ही वह सर्व सेवा संघ को उसी भूमि से बेदखल करने के लिए कोई कार्रवाई करेगा। इस दस्तावेज़ के प्रत्येक पृष्ठ पर उत्तर रेलवे (लखनऊ) के मंडल अभियंता और मंडल अधीक्षक के हस्ताक्षर हैं। गवाह के तौर पर दरबानलाल अस्थाना और प्रभाष चंद्र बनर्जी के भी हस्ताक्षर हैं. इसी प्रकार वर्ष 1961 और 1970 में सर्व सेवा संघ ने रेलवे की जमीन के कुछ और हिस्से खरीदे।

रेलवे को भी सेना से मिली थी यह जमीन

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि राजघाट स्थित कोहना गांव के किले की यह जमीन भी 1941 में सेना से रेलवे को मिली थी। तब ईस्ट इंडियन रेलवे ने अपने प्रतिनिधि सैन्य संपदा अधिकारी इलाहाबाद मंडल के माध्यम से एक समझौते के जरिए यह जमीन रक्षा विभाग से प्राप्त की थी। जिसका एक हिस्सा रेलवे ने संघ को बेच दिया। यह लोगों की समझ से परे है कि जो जमीन सर्व सेवा संघ द्वारा खरीदी गई और दशकों से पंजीकृत और कब्जे में थी, वह तकनीकी और तथाकथित प्रक्रियात्मक खामियों के कारण अचानक अवैध कैसे हो गई। गौरतलब है कि आईसीएसएसआर और राज्य सरकार ने काफी लंबे समय तक गांधीवादी अध्ययन संस्थान को वित्तीय सहायता दी थी।

इसे मोटे तौर पर केंद्र व राज्य सरकार की ओर से महात्मा की विरासत को आगे बढ़ाने वाली हर संस्था को कुचलने के एक जानबूझकर किए गए प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। यह सिर्फ गांधी, विनोबा या जेपी के विचारों पर हमला नहीं है, बल्कि आजादी और स्वतंत्र भारत के सपने पर हमला है, जिसके लिए कई लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने जीवन का बलिदान दिया, जिसने अंततः हमारे देश को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की बेड़ियों से मुक्त कराया।

सर्व सेवा संघ का आरोप

सर्व सेवा संघ की ज़मीन का मसला डीएम के क्षेत्राधिकार में नहीं था। हाईकोर्ट में केवल गांधी विद्या संस्थान का मसला था। जिसे कुछ वर्ष पूर्व 2007 में ज़िला अदालत ने भंग कर राज्य सरकार को सौंप दिया था। राज्य सरकार ने कमिश्नर वाराणसी को कस्टोडियन बनाया था। मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद कमिश्नर ने इंदिरा गांधी कला केंद्र को सौंप दिया, जिसके अध्यक्ष संघ के एक कार्यकर्ता हैं। यह अदालत की अवमानना है। बाद में हाईकोर्ट ने डीएम को आदेश दिया कि वह जांच कर लें और अगर गांधी विद्या संस्थान की ज़मीन सर्व सेवा संघ की है तो उसे सौंप दे।

हाई कोर्ट में मुख्य रूप से दो मांगें थीं। या तो संस्थान को बहाल किया जाए या वह ज़मीन उसके मूल मालिक सर्व सेवा संघ को वापस दी जाए। इस विवाद में सर्व सेवा संघ का बाक़ी कैम्पस शामिल नहीं था, और न ही रेलवे का कोई दावा था। रेलवे ने डीएम के सामने बाद में सर्व सेवा संघ की सम्पत्ति पर दावा किया था। रेलवे का दावा केवल सिविल कोर्ट सुन सकती थी।

लेकिन डीएम ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर सर्व सेवा संघ की सम्पत्ति पर दावा मंज़ूर कर लिया, जो क़ानूनन ग़लत और हाईकोर्ट की अवमानना है। अभी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामला बनारस सिविल कोर्ट में है और मामला सब जूडिस होने के बावजूद सरकार ने बंदूक़ के बल पर सर्व सेवा संघ आफिस और सारे आवास ख़ाली करा लिए गए। पिछले साठ साल के रिकॉर्ड्स और हज़ारों पुस्तकें, पत्रिकाएँ जाने कहां गईं। सर्वोदय जगत पत्रिका का रिकार्ड भी ये लोग उठा ले गए।

 

 


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