July 20, 2024 |

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प. बंगाल में मालदा जिले के इस विद्यालय पर भी बननी चाहिए फिल्म, जानिए क्यों?

Sachchi Baten

हबीबपुर  के दल्ला चंद्रमोहन विद्या मंदिर में कुरीतियों से लड़ने के लिए तैयार की जाती है बाल सेना

बाल विवाह, नारी उत्पीड़न, अंध विश्वास की सूूचना मिलते ही ढाई हजार छात्र व 40 अध्यापकों की फौज मौके पर पहुंचकर करती है जागरूक

इस विद्यालय में बच्चों के प्रवेश के लिए अभिभावकों को देना पड़ता से शपक्ष पत्र, वे बाल विवाह नहीं करेंगे

कोरोना जैसी आपदा के बीच विद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना टीम ने दिया मानवता का परिचय

विद्यालय के प्रधानाचार्य जयदेव लाहिड़ी को मिल चुका है राज्य स्तरीय शिक्षक रत्न पुरस्कार

 

मालदा से लौटकर राजेश पटेल, (सच्ची बातें) । ममता बनर्जी के राज्य पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक ऐसा स्कूल है, जहां बच्चे सिर्फ पढ़ते नहीं, कुरीतियों से लड़ने के लिए बाकायदा प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं।

इसी फार्म के माध्यम से बाल विवाह न करने का वचन लिया जाता है अभिभावकों से। सबसे नीचे ब्ल्यू टिक वाले बांग्ला में लिखे वाक्य में है जिक्र।

 

 

कहीं भी बाल विवाह, नारी उत्पीड़न, अंध विश्वास आदि की सूचना मिलती है तो इस स्कूल के करीब ढाई हजार बच्चे और 40 शिक्षकों की भारी-भरकम फौज पहुंच जाती है और उसे रोकने का प्रयास करती है। नहीं मानने पर प्रशासन का सहारा लिया जाता है। इस स्कूल का नाम है दल्ला चंद्रमोहन विद्या मंदिर। यह पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा अनुदानित है।

                                        प्रधानाचार्य जयदेव लाहिड़ी

पता नहीं क्यों द केरल स्टोरी फिल्म बनाने वालों की नजर इस विद्यालय पर क्यों नहीं पहुंची। यहां के प्रधानाचार्य जयदेव लाहिड़ी को राज्य स्तरीय शिक्षक रत्न पुरस्कार मिल चुका है।

बाल विवाह समेत अन्य कुरीतियों के खिलाफ मुहिम चलाने वाले प्राचार्य जयदेव लाहिड़ी।
यहां की खासियत यह है कि बच्चों का प्रवेश कराने के पहले अभिभावकों को उनका बाल विवाह न करने का शपथ पत्र जमा करना होता है।

प्राचार्य जयदीप लाहिड़ी ने बताया कि उन्होंने इस स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में 1999 में कार्य शुरू किया था। 2010 में वे प्राचार्य बने। उन्होंने देखा कि कक्षा आठ में पढ़ने वाली बच्चियां भी सिंदूर लगाकर आती थीं। बाल विवाह हो जाने के कारण उनके जीवन में आने वाली दुश्वारियों को भी बहुत करीब से देखा तो ठान लिया कि वे इस कुप्रथा को कम से कम स्कूल के दस किलोमीटर के दायरे में तो रोक ही सकते है।

इसकी शुरुआत अभिभावकों से शपथ पत्र भरवाने से की। पहले लोग आनाकानी करते थे। धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे अपने इरादे पर अडिग रहे। जो अभिभावक शपथ पत्र नहीं भरना चाहते थे, उनसे साफ कह दिया जाता था कि आपके बच्चे या बच्ची का प्रवेश इस स्कूल में नहीं हो सकता।

इसके बाद स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों व बच्चियों को बाल विवाह का विरोध करने के लिए समझाया गया। केस हिस्ट्री के माध्यम से उनके दिमाग में कूट-कूट कर भरा गया कि कम उम्र में शादी करने वाले मां-बाप उनके हितैषी नहीं, दुश्मन से भी बढ़कर हैं। अपना जीवन सुखी बनाना है तो इसका हर स्तर पर विरोध किया जाए। आज भी यह प्रशिक्षण जारी है। इसका परिणाम यह है कि स्कूल के करीब 12 किलोमीटर की परिधि वाले क्षेत्र में बाल विवाह बिल्कुल रुक गया है।

यदि कहीं आज भी ऐसी सूचना मिलती है तो पूरा स्कूल परिवार एक साथ पहुंचता है और शादी को रुकवा देता है। जरूरत पड़ने पर प्रशासन की भी मदद ली जाती है।
पश्चिम बंगाल में अंध विश्वास बहुत ज्यादा है। डायन के नाम पर महिलाओं के साथ अत्याचार आम बात है। बीमार होने या सांप के काटने पर ओझा-गुनी के यहां लोग जाते हैं। इसके बारे में भी स्कूल के बच्चे जागरूकता फैलाने का काम करते हैं।

इसके लिए हर बच्चे को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। यदि उनके गांव में किसी को सांप ने काट लिया तो सूचना मिलते ही वह बच्चा वहां पहुंचता है और अस्पताल भेजने की सलाह देता है। पहले विरोध, धमकी, और अब जब लोगों की समझ में आ गया कि जयदेव लाहिड़ी सही कर रहे हैं तो लोग तारीफ भी करने लगे हैं।

कोरोना काल में तो यहां के राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़े बच्चों ने तो मानवता की मिसाल कायम कर दी थी। जब रिश्तेदारों तक से मिलने में लोग डरते थे, उस समय छात्र-छात्राएं मास्क लगाकर गरीबों के बीच राहत सामग्री बांट रही थीं। राहत सामग्री का भी संग्रह खुद ही किया जाता था।

प्रवेश के लिए आने के पहले बाल विवाह न करने का शपथ पत्र तैयार कराकर लाते हैं। क्योंकि उनको पता है कि यहां इसके बिना प्रवेश नहीं होने वाला है। पढ़ाई भी अच्छी होती है, इसलिए इलाके के लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे का प्रवेश इसी स्कूल में हो। लाहिड़ी के इस कार्य की सराहना शिक्षा विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक के अफसर भी करते हैं। यहां सरस्वती पूजा में पुरोहित का काम कोई ब्राह्मण शिक्षक या छात्र नहीं करता। रूढ़ियों को तोड़ने के लिए यह काम किसी दलित आदिवासी शिक्षक या छात्र-छात्रा के कराया जाता है।


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