July 23, 2024 |

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खून के रिश्ते के बाद भी हैं अजनबी ही, जानिए पूरी कहानी…

Sachchi Baten

रक्तदान के मामले में देश में शतक लगा चुके हैं कई लोग, दो लोगों ने लगाया है दोहरा शतक

दोहरा शतक लगाने वाले दोनों महापुरुष हरियाणा के

राजेश पटेल, मिर्जापुर (सच्ची बातें)। खून का रिश्ता है, पर हैं अजनबी। वे किस जाति के हैं, किस धर्म के हैं और कहां के हैं, यह भी नहीं पता। लेकिन अपने खून से इनकी जिंदगी को सींचने का काम करते हैं। यह इनका शौक है। एक, दो बार नहीं,  सौ बार से ज्यादा रक्तदान किया है देश के कई लोगों ने। दो लोगों ने तो रक्तदान का दोहरा शतक भी लगा चुके हैं। उम्र की सीमा तो समाप्त हो गई, लेकिन इनके मन में अभी भी रक्तदान की इच्छा हिलोरें मारती रहती है।

पूरे 105 बार रक्तदान किया है उत्पल कुमार रॉय उर्फ नांटू दा ने। पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के निवासी हैं। इनके इस नेक कार्य के लिए प. बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने वर्ष 2018 विश्व रक्तदान दिवस पर सम्मानित किया था। इसके अलावा भी इनको ढेरों सम्मान मिले हैं, लेकिन कहते हैं कि असली संतोष तो उसी समय मिलता है, जब उनके खून से किसी की खत्म होती जिंदगी फिर से जीवंत हो उठती है।

 

रक्तदान का शतक लगाने पर उत्पल कुमार रॉय को सम्मानित करते तत्कालीन राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी

 

उम्र सीमा खत्म हो गई, फिर भी है रक्तदान की इच्छा
नांटू दा कहते हैं कि रक्तदान करने के लिए अधिकतम 65 वर्ष की जो उम्र सीमा तय की गई है, उसे वे पार कर चुके हैं। लिहाजा अब चाहकर भी किसी को जीवन नहीं दे सकते। हालांकि रक्तदान करने की उनकी इच्छा अभी जिंदा है। और, शारीरिक तथा मानसिक रूप से पूरी तरह से स्वस्थ भी हैं। इसलिए आवेदन दिया है कि शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति को 70 वर्ष तक रक्तदान करने की अनुमति दी जाए। उम्मीद है कि उनकी मांग को मान लिया जाएगा।

पहली बार 1974 अप्रैल में किया था रक्तदान, बची थी एक मां की आंखों के तारे की जिंदगी
नांटू दा कहते हैं कि पहली बार अप्रैल 1974 में रक्तदान किया था। वह घटना आज भी याद है। सिलीगुड़ी अस्पताल में एक बूढ़ी महिला सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल अपने बेटे के पुनर्जीवन के लिए खून के लिए इधर-उधर गिड़गिड़ा रही थी।  उस समय अस्पताल में ब्लड बैंक नहीं था। बूढ़ी महिला से कहा जा रहा था कि किसी खून देने वाले को ले आइए। मैं वहीं पर संयोग से खड़ा था। बूढ़ी महिला की विवशता को देखा तो मैंने कहा कि मेरा खून चेक करिए। मिल जाता है तो देने के लिए तैयार हूं। चेक हुआ। संयोग से ग्रुप मिल भी गया। मैंने खून दे दिया। इसके बाद उस बूढ़ी मां ने जिस आदर भाव से मुझे देखा, उसके कारण मैंने उसी दिन ठान लिया कि अब नियमित अंतराल पर रक्तदान करता रहूंगा। सही मायने में रक्तदान का महत्व उसी दिन समझ में आया। इसके बाद दिल्ली, मुम्बई और कोलकाता समेत कई शहरों में जाकर रक्तदान किया।

रक्तदान का अर्धशतक पूरा हुआ 2004 में, शतक 2017 में
रक्तदान का अर्धशतक 12 जनवरी 2004 को पूरा हुआ। इस समय तक वे रक्तदान के लिए बनाई गईं कई संस्थाओं से जुड़ गए थे। शतक पूरा हुआ 19 मई 2017 को। कुल 105 बार रक्तदान किया।

पियूष कांति रॉय ने 103 व अतुल झंवर ने 100 बार किया है रक्तदान

103 लोगों की रगों में पियूष कांति रॉय उर्फ पिंटू दा का तथा 100 से ज्यादा लोगों में अतुल झंवर का खून बह रहा है। रक्तदान के मामले में शतक लगाने वाले ये दोनों महानुभाव सिलीगुड़ी के ही हैं। इन लोगों ने स्वेच्छा से रक्तदान कर अजनबियों की जान बचाई है।

पिंटू दा इस समय करीब 65 वर्ष के हो गए हैं। उनको मलाल है कि मेडिकल साइंस के लिहाज से अब वे किसी को अपना रक्त दान नहीं कर सकते। पिंटू दा ने सौवीं बार रक्तदान 14 जून 2015 को किया था।

अतुल झंवर को रक्तदान का शतक पूरा करने में करीब 31 वर्ष लग गए। पहली बार रक्तदान 1987 में तथा सौवीं बार 19 सितंबर 2018 में किया। इनकी इच्छा है कि कम से कम सवा सौ के आंकड़े को पार कर लें।

 

झंवर ने बताया कि अभी स्वास्थ्य पूरी तरह से ठीक है। ऐसा कर ही लेंगे। इनका ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव है। ये सिलीगुड़ी तराई लायंस ब्लड बैंक के चेयरमैन भी हैं। खुद तो रक्तदान करते ही हैं, दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने के लिए अपनी संस्था की ओर से कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं।

जानिए पियूषकांति रॉय उर्फ पिंटू दा के बारे में
पिंटू दा जब 16-17 साल के थे। कॉलेज में कदम ही रखे थे, तभी उन्होंने पहली बार रक्तदान किया। वह बड़े थैलेसीमिया कार्यकर्ता भी हैं। अब तक 67 थैलेसीमिया पीड़ितों की ‘स्पलीनोटॉमी’ करवा चुके हैं। इसमें सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के जाने-माने सर्जन रहे डॉ. विवेक सरकार से उन्हें बड़ी मदद मिली।

‘स्पलीनोटॉमी’ एक ऐसी चिकित्सा है, जिसके तहत थैलेसीमिया पीड़ितों के शरीर से तिल्ली बाहर निकाल दी जाती है। इससे, बार-बार अपना रक्त बदलवाने की उनकी निर्भरता का अंतराल तीन महीने से बढ़ कर एक साल हो जाता है। यह थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए बड़ी राहत है। पिंटू दा सतत थैलेसीमिया जागरूकता अभियान भी चलाते रहते हैं।विद्यार्थी जीवन में स्काउटिंग में बेहतर प्रदर्शन के लिए वर्ष 1968 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के हाथों प्रेसिडेंट अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके हैं। एसोसिएशन ऑफ वॉलेंटरी ब्लड डोनर्स (कोलकाता) और वेस्ट बंगाल वॉलेंटरी ब्लड डोनर्स फोरम से जुड़े रहे। वर्ष 2014 में अपनी संस्था सिलीगुड़ी वॉलेंटरी ब्लड डोनर्स फोरम की स्थापना की। उसके बाद से अब तक उसी के माध्यम से समाज सेवा में लगे हुए हैं।

 

             सौ बार रक्तदान करने पर आनंद अग्रवाल को सम्मानित करते लोग। फोटो सिलीगुड़ी टाइम्स

सिलीगुड़ी के ही आनंद अग्रवाल ने भी रक्तदान का शतक बना लिया है। कोलकाता के व्यापारी धनिश सेठ, उदयपुर शहर के रक्तवीर के नाम से प्रख्यात रविंद्र पाल कप्पू,  इंदौर के अनिल, दिल्ली के डॉ. नरेश कुमार भाटिया, राहुल शोलापुरकर, मदन मोहन आहूजा, राजकुमार बजाज, सतीश अदलखा, आनंदकांत भाटिया, कैलाश नरूला, सुनील मस्ता, उत्तराखंड के अनिल वर्मा,  ओडिशा के प्रताप कुमार त्रिपाठी,  जी संजीब कुमार, तमिलनाडु के एल संतराम, झारखंड के एसके सिंह, पश्चिम बंगाल के परेश सरकार, अनूप घोष, असीम घोष, तपन कर, जयंत मुखर्जी, असीम धर, अपूर्बा घोष, श्यामल चटर्जी, अजय प्रसाद, महाराष्ट्र के दीपक कुमार शुक्ला, उत्तर प्रदेश के नकवी मोहम्मद मेहदी, उज्जैन के शब्बीर, बनारस के बल्लभाचार्य पांडेय, रामचन्द्र हासवानी, हिमाचल प्रदेश के मंडी के धर्मेंद्र राणा, झारखंड के गिरीडीह के शीर्षेंदु सेनगुप्ता, सुबोध प्रकाश, कोटा के हरजिंदर सिंह आदि ने भी रक्तदान का शतक लगा लिया है। किसी ने सौ बार तो किसी ने सौ बार से भी ज्यादा बार रक्तदान किया है।

हरियाणा के यमुनानगर में 12 लोगों ने 100 से अधिक बार रक्तदान किया है। दूसरे नंबर पर सोनीपत है, यहां 11 लोग शतक लगाने वाले हैं। इसके बाद क्रमश: रोहतक के 8, फरीदाबाद के 5, पंचकूला और हिसार के चार-चार लोग इसमें शामिल हैं। अंबाला, भिवानी और करनाल के 3-3 एवं जींद, कुरुक्षेत्र, पानीपत और रेवाड़ी में भी एक-एक शतकवीर हैं।

यमुनागर के लक्ष्येंद्र कुमार गोयल (179 बार), प्रवीण मुदगिल (178), सत्यपाल पंवार (145), अजय दत्त वाशिष्ठ (140), प्रीतम सिंह मौर (132), संजीव ओझा (138), हुकम चंद (117), अनिल अग्रवाल (113), नरेन्द्र मुखिजा (120), डाॅ. रमेश कुमार (100), सुधीर वैद्य (103)। अम्बाला के शतकवीर इस तरह से हैं- प्रदीप शर्मा (136), सुरेन्द्र दुबे (109)। भिवानी के रमेश कुमार (110), प्यारे लाल (105), राजेश कुमार (104) के साथ ही फरीदाबाद के मदन मोहन आहुजा (160), राजकुमार बजाज (132), सतीश अदलख्खा (105), कैलाश नरूला (100), सुनील (100) हैं। हिसार से विकास गोयल (122), रामनिवास (104), ओम कुमार (100), वेद प्रकाश (101) शतकवीर हैं तो जींद से प्रवीण कुमार (105) एवं करनाल से कैप्टन डा. सुरेश सैनी (136), महेन्द्र छाबड़ा (150), दिनेश बख्शी (125) एवं कुरुक्षेत्र से डा. अशोक वर्मा (149) इस श्रेणी में शामिल हैं। इसी तरह पंचकूला से रणदीप (137), प्रवीण पुंज (108), अजय गुप्ता (104), अश्वनी (102) के अलावा पानीपत से संजय ठाकुर सैन (123), रेवाड़ी से राम किरत यादव (103), रोहतक के सतबीर सिंह (146), सुंदर जेतली (137), सुरेन्द्र सिंह (134), गोवर्धन (130), रणवीर (125), ऋषिपाल मलिक (121), दारा सिंह (114), सतीश सनेजा (102), सोनीपत के सुरेन्द्र विश्वास (178), राहुल गोयल (153), ठाकुर जगपाल सिंह (140), श्याम सुंदर जिंदल (116), सुनील जिंदल (114), नरेन्द्र भूटानी (113), शमशेर (109), आशीष कुमार (109), दलबीर आर्य (103), धर्मवीर दहिया (102) शतकवीर हैं।

और ये हैं दोहरा शतक लगाने वाले

 

यमुनानगर के अरुण अग्रवाल 66 वर्ष से ज्यादा के हो गए हैं। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में रक्तदान करना शुरू किया था। रक्तदान व ब्लड प्लेटलेट्स संख्या में 249 बार दान किया है। इसी प्रकार अंबाला के राजेन्द्र गर्ग बताते हैं कि उन्होंने साढ़े 17 वर्ष की आयु में रक्तदान देना शुरू किया था। पहली बार उन्होंने इंडो पाक युद्ध में चंडीगढ पीजीआई में रक्तदान किया था। 68 वर्षीय राजेन्द्र बताते हैं कि उन्होंने 206 बार रक्तदान किया है।

 


Sachchi Baten

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