July 20, 2024 |

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INDIA : 26 दलों के बीच आम आदमी पार्टी का प्रवेश केजरीवाल का ड्रामा

Sachchi Baten

अध्यादेश गिरा तो फिर बिखर जाएगी विपक्षी एकता

कांग्रेस के साथ आप का बैठना असम्भव, अध्यादेश की कीमत पर आप साथ

पटना में ही दिखा दिया था केजरीवाल ने अपना रंग

कांग्रेस का साथ भी अध्यादेश पास होने की गारंटी नहीं

 

हरिमोहन विश्वकर्मा, दिल्ली। आखिर आप -कांग्रेस में बात बन गई, यह विपक्षी एकता गठबंधन से बड़ी खबर इसलिए है कि आप ने अपने रास्ते तलाश कर आगे बढ़ने का जो बीड़ा अपने जन्म से अब तक उठाया है, उसमें किसी दल से गठबंधन के सहारे आगे बढ़ने का कोई विकल्प ही नहीं है। इसीलिये ज़ब दिल्ली में आप की पहली बार अल्पमत की सरकार बनने की बात आई तो कांग्रेस के समर्थन के आग्रह के बावजूद अरविन्द केजरीवाल ने इसे ठुकरा दिया और दोबारा चुनाव में गये।

उसके बाद क्या हुआ, वह इतिहास बन गया, जिसे हम आप सब जानते हैं। वास्तव में आप का अब तक का राजनीतिक सफऱ ही कांग्रेस की छोटी -छोटी मज़ारों पर ही टिका है। दिल्ली से लेकर पंजाब तक और गुजरात से लेकर राजस्थान तक।

अरविन्द केजरीवाल और एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवेसी, ये दो शख्सियतें ऐसी हैं, जो कुदाल – फावड़ा लेकर कांग्रेस की कब्र खोदने जहाँ -तहां निकल पड़ती हैं। इसका स्वाभाविक फायदा भाजपा को होता ही है, इसीलिए उन्हें भाजपा की बी टीम भी कह दिया जाता है।

इस बार मामला जरा अलग है। क्योंकि अध्यादेश के रूप में केजरीवाल की पूंछ केन्द्र सरकार दाबे हुए है और केजरीवाल को लग रहा है कि अगर कांग्रेस साथ हो तो केन्द्र सरकार के नीचे दबी पूंछ राज्यसभा में निकाली जा सकती है। पटना बैठक से लेकर बेंगलुरु तक आप ने इसे छुपाया नहीं कि वह क्यों गठबंधन का हिस्सा बनने को उत्सुक है।

पटना में ज़ब उसे नहीं लगा कि उसकी बात बनने लायक है तो उसने साफ़ कह भी दिया कि अगर अध्यादेश पर कांग्रेस का साथ नहीं तो, आप गठबंधन के साथ नहीं। मजबूरन, साथी दलों के दबाव और खिन्नता में उसे ऐलान करना पड़ा कि वह गठबंधन पर आप का राज्यसभा में साथ देगी।

केजरीवाल बेंगुलरु पहुंचकर गठबंधन का हिस्सा बन गये। अब किस्सा ये है कि फ़ौरी तौर पर कांग्रेस आप के साथ है और आप गठबंधन के साथ है। पर ये सवाल अब भी बाकी है कि अगर राज्यसभा में अध्यादेश कांग्रेस के समर्थन के बावजूद पास नहीं हो पाया तो क्या आप आगे गठबंधन के साथ चलेगी?

शायद, इसका पक्का जवाब न में ही होगा। क्योंकि आम आदमी पार्टी और उसके नेता की फ़ितरत में ही नहीं कि वे किसी और की चाबी से चलें। ऐसे आसार हैं भी कि आप को मिले कांग्रेस के समर्थन के बावजूद अध्यादेश को सरकार राज्यसभा में आराम से पास करा लेगी। इसकी वजह बीआरएस, जगन और नवीन पटनायक हैं, जो हमेशा जरूरत के क्षणों में सरकार के साथ राज्यसभा में खड़े होते हैं और अब भी होंगे।

बेंगलुरु से विपक्षी नेताओं ने इसीलिए जरूरत पर तटस्थ रहने वाले नेताओं को सन्देश भी दे दिया है कि तटस्थता नीति अब स्वीकार नहीं। जो दल विपक्षी गठबंधन में नहीं आते, वे जाहिराना तौर पर सरकार के साथ माने जाएंगे।
दरअसल, आज आप की महती जरुरत राज्यसभा में केन्द्र सरकार के उस अध्यादेश की धज्जियाँ उड़ाना है जो अर्द्धशासित राज्य दिल्ली में चुनी गई आप सरकार को महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता से रोकता है और इसके लिए दिल्ली राज्य को हर काम के लिए केन्द्र द्वारा नियुक्त एलजी की ओर देखने को विवश करता है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इसके लिए हर राजनीतिक दल के मुखिया के दरवाजे की खाक भी छान रहे हैं। फिर भी राज्यसभा में केन्द्र सरकार से मुकाबले की स्थिति तभी बन सकती है, ज़ब कांग्रेस आप का साथ दे। कांग्रेस इस मूड में कतई नहीं, पटना की विपक्षी दलों की पहली बैठक तक में कांग्रेस का यही रुख था जो बेंगलुरु आते आते कमजोर हो गया। क्योंकि कांग्रेस का ये रुख विपक्षी एकता की राह में सबसे बड़ी बाधा था।

लेकिन मूल मुद्दा यह है कि कांग्रेस अगर अध्यादेश को राज्यसभा में समर्थन देती भी है तो भी राज्यसभा में विपक्ष की कुल संख्या 103 ही है, जो एनडीए की संख्या 112 से काफी कम है। फिलहाल 238 सदस्यों की राज्यसभा में भाजपा को भी 8 और राज्यसभा सदस्य जुटाने हैं, जो उसके लिए मुश्किल नहीं तो असम्भव भी नहीं है। उसके साथ भारत राष्ट्र समिति, तेलुगु देशम, बीजू जनता दल और जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर का साथ है, जिन्होंने धारा 370, तीन तलाक जैसे मुद्दों पर सरकार का साथ दिया। अगर राज्यसभा में ऐसा होता है तो चट से कोई न कोई आरोप कांग्रेस पर मढ़ कर आप गठबंधन से छिटक जाएगी। तब तक आप का विपक्षी एकता में नौटंकी राग सुनना भी एक अनुभव है।


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