July 23, 2024 |

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लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल नहीं हैं 5 राज्यों के चुनाव

Sachchi Baten

राज्य हारने के बाद भी लोकसभा जीतती आई है भाजपा

-राज्य और केन्द्र में अलग-अलग मुद्दों पर वोट देते आए हैं वोटर

-उड़ीसा, राजस्थान, मप्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य हैं उदाहरण

 हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। राज्यों के विधानसभा चुनावों को भले लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल बताया जा रहा हो, लेकिन आंकड़े और इतिहास दोनों यह बताते हैं कि विधानसभा चुनाव के परिणाम लोकसभा चुनाव के लिए अहम नहीं नहीं हैं। ख़ासकर भाजपा तो पिछले दो लोकसभा चुनाव में इस थ्योरी को पलटती आई है।

2018 में बीजेपी सीधे मुकाबले वाले तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़- में कांग्रेस से हार गई थी। लेकिन बमुश्किल छह महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में उसने बाजी पलट दी। तब तीनों राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीटों में से उसने 61 पर कब्जा कर लिया था।

इसका मतलब है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वोटरों की प्राथमिकता बदल गई थी। उड़ीसा का ही उदाहरण लीजिये, जहां 2019 में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हुए थे। बीजू जनता दल ने 146 सीटों वाली विधानसभा में 112 सीटें जीतकर लगातार पांचवीं बार सत्ता हासिल की, लेकिन लोकसभा चुनाव में 21 में से 12 ही सीटें वह जीत पाई। वहीं, बीजेपी ने 8 सीटें झटक लीं, जबकि दोनों चुनाव एक साथ हुए थे। यानी मतदाता राष्ट्रीय और राज्यों के चुनाव में अपने हित-अहित बखूबी पहचानते हैं। राष्ट्रीय चुनावों को अब राज्यों के चुनाव नतीजों के सापेक्ष नहीं देखा जा सकता।

हाँ, राज्यों के चुनाव ऐसा आधार जरूर मुहैया कराते हैं, जिन पर पार्टियां खुद को दोबारा खड़ा कर सकती हैं। उदाहरण, नब्बे और दो हजार के दशक में बीजेपी ने खुद को गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कुछ हद तक राजस्थान में अपने राज्य स्तरीय प्रदर्शनों की बदौलत ही खड़ा किया।

2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में मिली शिकस्त के बावजूद इन राज्यों के चुनाव नतीजों ने बीजेपी को मैदान में बनाए रखा। आजकल कांग्रेस अपनी ऐसी ही पुनर्वापसी सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है। खासकर हिमाचल प्रदेश में पिछले साल और इस साल कर्नाटक में हुई विजय के बाद।

जाहिर है, पांच राज्यों के ये चुनाव दोनों दलों के लिए अहम हैं। फिर भी इनका सबसे ज्यादा असर दोनों दलों के क्षत्रपों की भूमिका पर पड़ने वाला है। किस्मत से फिलहाल भाजपा के पास मोदी हैं, जिनकी देशव्यापी अपील है और जिसका असर न केवल पार्टी के अंदर बल्कि पूरे एनडीए गठबंधन में भी दिखता है।

इसी के तहत कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा और कुछ अन्य नेताओं को विधानसभा चुनाव से कुछ ही पहले हटाया गया। अलग बात है कि ये बदलाव कर्नाटक में काम नहीं आया, लेकिन उत्तराखंड और गुजरात में इसके अच्छे नतीजे देखने को मिले। वैसे इस बार बीजेपी बड़े बदलाव करने से बचती भी दिख रही है, यहां तक कि उसने किसी राज्य में मुख्यमंत्री प्रत्याशी भी घोषित नहीं किया।

इसका मतलब है कि आगे के हालात बहुत कुछ सीटों की संख्या पर निर्भर करेंगे। स्पष्ट बहुमत की स्थिति में राष्ट्रीय नेतृत्व का जोर बढ़ सकता है, लेकिन जीत-हार का अंतर कम होने पर लोकल लीडरशिप की भूमिका बढ़ जाएगी। इसीलिए मप्र व राजस्थान चुनाव शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे सिंधिया जैसे नेताओं के लिए खासे अहम हैं, जिनकी भूमिका इस बात पर निर्भर करेगी कि उनके पाले में कितने विधायक होते हैं।

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो वहां आलाकमान को प्रदेश इकाइयों में चल रही गुटबाजी का फायदा मिलता रहा है। राजस्थान में अगर कांग्रेस सरकार चलती रही है तो उसके पीछे अशोक गहलोत की राजनीतिक कुशलता है। छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव की मौजूदगी के कारण कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर लगातार अंकुश बना सकी।

कर्नाटक में सीएम सिद्दारमैया और डेप्युटी सीएम डीके शिवकुमार के बीच भी कुछ ऐसा ही समीकरण बना हुआ है। लेकिन बघेल, गहलोत या कमलनाथ जीतते हैं तो कांग्रेस के आंतरिक समीकरण बदल जाएंगे। जीत के बाद ये नेता ज्यादा मजबूत होकर उभरेंगे और चाहेंगे कि पार्टी में केंद्रीय स्तर पर ऐसे बदलाव हों जिससे उनके अपने गढ़ सुरक्षित रहें।

ये चुनाव यह भी बताएंगे कि कांग्रेस कितना मजबूत होकर उभरती है। इसी से इंडिया गठबंधन के अंदर क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच रिश्तों का स्वरूप भी तय होगा। तेलंगाना चुनाव इस मायने में कांग्रेस के लिए खास है,  क्योंकि इससे यह पता चलेगा कि वह क्षेत्रीय दलों के लिए कितना बड़ा खतरा बनने वाली है। दिलचस्प बात यह कि कांग्रेस की यह मजबूती बीजेपी को संभावित सहयोगी भी मुहैया करा सकती है। इसके उलट, कमजोर कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के लिए ज्यादा सुविधाजनक होगी।


Sachchi Baten

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