July 19, 2024 |

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एहि ठइयां मोतिया हेराय गइल रामा…

Sachchi Baten

जन्मदिन : 8 मई (1929)  ठुमरी की रानी, गिरिजा देवी

-राघवेंद्र दुबे भाऊ
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काशी के संकट मोचन से गिरिजा देवी जी का गहन भावात्मक लगाव काशी हिंदू विश्वविद्यालय आइआइटी में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष वर्तमान महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र के पितामह तत्कालीन महंत स्व. पंडित अमरनाथ मिश्र के समय से रहा है।
मुझे खूब याद है सुर साम्राज्ञी गिरिजा देवी जी से मेरा परिचय प्रो. मिश्र जी के पिताश्री, काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रौद्योगिकी संस्थान में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर, विश्वविख्यात पर्यावरणविद्, टाइम मैगजीन पोल के मुताबिक मिलीनियम व्यक्तित्व, तत्कालीन महंत पूज्य वीरभद्र मिश्र जी के जरिये हुआ था । पूज्य वीरभद्र मिश्र जी से मुझे पुत्रवत स्नेह प्राप्त था । दुनिया के तमाम राजनयिकों, राजनेताओं और साहित्य – संगीत के अंतर्राष्ट्रीय शिखर व्यक्तित्वों से मुझ जैसे साधारण का मिलना उनके ही माध्यम से संभव हुआ ।
मुझे 2017 का वह बहुत सांद्र संवेदनात्मक समय कैसे भूल सकता है । गिरिजा देवी होली पर बनारस के नाटी इमली स्थित अपने घर आई थीं । प्रो. विशम्भरनाथ मिश्र ने गिरिजा देवी के सम्मान में तुलसी घाट पर एक आयोजन किया था । आयोजन खत्म होने के बाद प्रो. मिश्र उन्हें गाड़ी तक छोड़ने आए तो उनसे कहा –‘ हनुमान जयंती के अवसर पर संकट मोचन संगीत महोत्सव के आयोजन को तिरानवे वर्ष हो चुके हैं । इस परम्परा की नींव रखने वाले मेरे बाबा ( महंत अमरनाथ मिश्र ) को आप भाई जी कहती हैं परन्तु इस संगीत समारोह में आपने केवल एक बार 2005 में हाजिरी लगाई है, यह बात मुझे सालती है ।…’
प्रो. मिश्र का हाथ अपने हाथों में लेते गिरिजा देवी ने वायदा किया था — ‘ जो हुआ, सो हुआ , पर अब जब तक मेरा जीवन है मैं संकट मोचन संगीत महोत्सव में जरूर हाजिरी लगाती रहूंगी ‘..।
गिरिजा जी 1980 में आईटीसी संगीत रिसर्च अकेडमी कोलकाता की और 1990 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की फैकल्टी मेंबर थीं । उन्हें पूरबी आंग ठुमरी में महारथ हासिल थी । उन्होंने अर्द्ध शास्त्रीय शैलियों जैसे कजरी, होली, चैती को अलग , श्रेष्ठतम और वैश्विक फलक दिया । उन्हें ख्याल, भारतीय लोक संगीत और टप्पा में भी विलक्षणता हासिल थी ।
गिरिजा जी को 1972 में पद्मश्री , 1989 में पद्मभूषण और 2016 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था । उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, अकादमी फेलोशिप समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है ।
मन्नू दुबे जी कहती थीं — ‘ जिया मोरा दरपावे ’ गीत केवल किसी चिरंतन सत्य का उदघाटन ही नहीं , दादी मां के आख्यानों की शक्ल में हमारी भौतिक – आध्यात्मिक चेतना को भी आवाज थी । मन्नू दुबे जी को भी गिरिजा देवी जी से मिल लेने का सौभाग्य हासिल था । ‘संवरिया को देखे बिना नाही चैना’ बार – बार खुद तक लौट आती है तो इसलिये कि जीवन के विराट सूनेपन में रागात्मक मिलन की जिद ठान लेती है । मन्नू जी कभी – कभी खुद गुनगुना पड़ती थीं — ‘ धीरे से झुलाओ बनवारी संवरिया, सुर, नर, मुनि सब शोभा देखे’ ।
पंडित रविशंकर, अली अकबर , विलायत खान साहब जैसे दिग्गज ( अब मां कहूंगा ) मेरी मां गिरिजा देवी के प्रशंसक थे । आयरन लेडी ऑफ द वर्ल्ड, पूज्या इंदिरा जी भी गिरिजा देवी की फैन थीं ।
साहित्य – संगीत – कला संवेदना तो गांधी – नेहरू परिवार को पंडित नेहरू से विरासत में मिली है । इंदिरा जी कई बार संकट मोचन संगीत महोत्सव में आयीं । वह तत्कालीन महंत वीरभद्र मिश्र जी का आदर करती थीं । विधिवत निमंत्रण – आमंत्रण के बाद भी मोदी जी संकट मोचन संगीत महोत्सव में नहीं आये ।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। अपने विचारों के माध्यम से संस्कृति के संरक्षण के साथ भविष्य के भारत को लेकर जागरूक करते रहते हैं। यह पोस्ट भाऊ के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। )

Sachchi Baten

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