July 19, 2024 |

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चुनार की विद्वत्ता की पहचान थे डॉ. ताड़कनाथ सिंह

Sachchi Baten

इतिहास खुद लिखना होगा, नहीं तो पीढ़ियां भुला देंगी

आस्ट्रेलिया की सरकार ने डॉ. सिंह को अपने यहां के सर्वोच्च शिक्षा सम्मान विलियम कलरास से नवाजा

-पौधों में शुष्क अवरोधन क्षमता पर अनुसंधान को डिसकवरी का दर्जा मिला

-चुनार के बघेड़ा गांव में जन्मे थे डॉ. ताड़कनाथ सिंह

 

धीरेंद्र सिंह उर्फ धीरूभाई पटेल

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अपनी विद्वता व लेखकीय क्षमता बल पर स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने वालें चुनार क्षेत्र के बघेड़ा (मनिकपुरा) गांव निवासी मास्टर दीप नरायन सिंह की चौथी औलाद के रूप में दो जुलाई 1944 को जन्मे ताड़कनाथ सिंह में विलक्षण प्रतिभा थी। प्राथमिक शिक्षा बगल के गांव नियामतपुर कलॉ में अभूतपूर्व विधायक व जननेता रहे बाबू यदुनाथ सिंह जी के साथ हुई।

दोनों  ही विलक्षण प्रतिभा वाले छात्र जीवनभर गहरे मित्र बने रहे। प्राे. ताड़कनाथ नाथ सिंह की माध्यमिक शिक्षा स्व. भाउराव देवरस द्वारा स्थापित माधव विद्या मंदिर पुरुषोत्तमपुर में उनके आदर्श शिक्षक रहे स्व. अर्जुन सिंह जी के संरक्षण में पूर्ण हुई। तत्पश्चात् हाईस्कूल व इण्टर की तालीम पीडीएनडी इंटर कॉलेज, चुनार से मीरजापुर जिले के टॉपर छात्र के रूप में पूर्ण हुई।

हाईस्कूल में पढ़ते समय ही इनके पिता मास्टर दीप नरायन सिंह का निधन हो गया। तब इनके बड़े  भाई पारस नाथ सिंह ने  खेती व पशुपालन कर घर-परिवार की जिम्मेदारी बखूबी निभाई और अपने भाई की पढ़ाई के लिए कड़ी मेहनत की।

इंटर में पढ़ते समय ही इनकी व बड़े भाई पारस नाथ सिंह की शादी बगल के गांव बहादुरपुर की विधवा दौलती देवी की सगी लड़कियों के साथ हो गई। बड़े भाई ने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए विश्व प्रसिद्व शिक्षण संस्थान बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दाखिला कराया। वहां बीएससी (कृषि) में गोल्ड  मेडलिस्ट व एमएससी (कृषि) में पूरे विश्वविद्यालय में टॉप कर इतिहास रच दिया।

तत्पश्चात् आस्ट्रेलियाई सरकार की मेरिट फेलोशिप पर एडिलेड यूनिवर्सिटी आस्ट्रेलिया में शोध-छात्र के रूप में प्रवेश हुआ, जहं इन्होंने पीएचडी (डाक्टरेट) की उपाधि गोल्ड-मेडलिस्ट के रूप में प्राप्त की। पूरे विश्वविद्यालय में टॉप करने के कारण आस्ट्रेलियाई सरकार ने इन्हे शिक्षा क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मान ‘विलियम कलरास‘ से नवाजा। एडिलेड यूनिवर्सिटी में ही अध्यापन व शोध क्षेत्र में कार्य करने का अनुरोध किया, पर घर-परिवार व अपने स्वर्गीय पिता के अरमानों को याद कर स्वदेश लौटने का फैसला किया।

स्वदेश लौटकर 1972 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में बतौर प्रोफेसर व कृषि वैज्ञानिक के रूप में ‘पौधों में शुष्क अवरोधन क्षमता‘ पर किए गए इनके अनुसंधान को ‘‘डिसकवरी‘‘ का दर्जा प्राप्त हुआ तथा पौधों पर संगीत के प्रभाव का परीक्षण किया, जिसे दुनिया की सबसे प्रसिद्व शोध-पत्रिका ‘‘नेचर‘‘ में प्रकाशित किया गया।

1976 में नव-निर्मित आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं शोध विश्वविद्यालय कुमारगंज, फैजाबाद (उप्र) में चीफ साइंटिस्ट के रूप में कार्य भार संभाला, जहां उनके नेतृत्व में सैकड़ों शोधकार्य
सफल हुए और 300 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हुए, जिनकी सराहना देश-विदेश के वैज्ञानिकों ने की और विश्व की सर्वाधिक प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘‘नेचर‘‘ में भी इनके दर्जनों शोध-पत्र प्रकाशित हुए। इसका सर्वाधिक लाभ भारतीय किसानों को हुआ।

इसी बीच 1977 में कुलपति के रूप में प्रोफेसर अतर सिंह यादव ने विश्वविद्यालय में कार्यभार ग्रहण किया और चीफ साइंटिस्ट प्रोफेसर ताड़क नाथ सिंह की शोध क्षेत्र में ख्याति को देखते हुए अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया। 1977 से लेकर 1980 तक इनके नेतृत्व में
उत्कृष्ट शोध कार्य के साथ विश्वविद्यालय में लगभग 500 कर्मचारियों की नियुक्ति हुई, जिसमें लगभग 300 विभिन्न श्रेणी के कर्मचारी व वैज्ञानिक पिछड़े वर्ग से आने वाले नियुक्त हुए और फिर पूरे प्रदेश में तहलका मच गया और मनुवादी विचारधारा के लोग विरोध पर उतर आए।  कहने लगे कि विश्वविद्यालय में शिक्षण व शोध कार्य के लिए पिछड़े व दलित वर्ग के लोग विश्वविद्यालय की गरिमा को धूमिल करेंगे। परन्तु, कुलपति डॉ. अतर सिंह यादव के रुख के आगे सभी विरोध के स्वर बन्द हो गये।

कुलपति प्रोफेसर अतर सिंह यादव के जाने के बाद मनुवादी विचारधारा के लोग डॉ. ताड़कनाथ सिंह को तरह-तरह से परेशान करने लगे। इससे आजिज आकर इनका झुकाव मनुवादियों को सबक सिखाने की ओर हुआ और 1982 में मान्यवर कांशीराम के मूवमेंट बामसेफ से जुड़ गए। 1984 में स्थापित बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे तथा 1989 में पहली बार अपने ही प्रिय मित्र बाबू यदुनाथ सिंह के विरुद्ध चुनार क्षेत्र से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और बाबू यदुनाथ सिंह को कड़ी टक्कर दी। फिर 2002 में चुनार क्षेत्र से ही मिनी मुख्यमंत्री की पहचान रखने वाले मंत्री ओम प्रकाश सिंह के विरुद्ध बसपा प्रत्याशी के रूप में कड़ी टक्कर दी और निकटतम प्रतिद्वंदी रहे। फिर 2007  में बाबू यदुनाथ सिंह व प्रो. ताड़कनाथ सिंह ने चुनार क्षेत्र से संयुक्त प्रत्याशी के रूप में प्रो. ताड़कनाथ बाबू यदुनाथ सिंह के नाम से नामांकन कर दोस्ती की मिसाल कायम की और दोनों लंगोटियायार ने ओमप्रकाश सिंह को नाकाें चने चबवाए।

2010 में  प्रो. सिंह ने पुनः विदेश जाने का फैसला लिया और इस दौरान ये अमेरिका, इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, जापान, फिलिपिंस, यूथेपिया आदि देशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान की और इसी बीच 2015 में मनीला विश्वविद्यालय, फीलिपिंस ने इन्हें डीएससी (डाक्टर ऑफ साइंस) की उपाधि से विभूषित किया।

2020 में वैश्विक कोरोना काल में पुनः स्वदेश (घर) लौट आए और सात दिसम्बर 2021 को 78 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया। चुनार में जन्मीं तमाम विभूतियों में एक डॉ. ताड़कनाथ सिंह को नमन।


Sachchi Baten

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