July 24, 2024 |

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MIRZAPUR : काई की न समझें, सूखा में यह किसानों की चमड़ी की पपड़ी है साहब

Sachchi Baten

तुम्हारी फाइलों में तो गावों का मौसम गुलाबी है, हकीकत  देखिए…

 

पानी  के अभाव में नर्सरी सूख रही है, कृषि विभाग के आंकड़े में धान की रोपाई आधे से ज्यादा हो गई

सावन में पहली बार काई की पपड़ी बनते देख रहे हैं

अहरौरा कमांड के साथ जरगो कमांड की भी स्थिति अत्यंत चिंताजनक

राजेश पटेल, मिर्जापुर (सच्ची बातें)। तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है। मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।...सरकार और उसके अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर अदम गोंडवी जी का यही शेर याद आता है।

मिर्जापुर जिले में दशकों बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे अहरौरा कमांड की कौन कहे, जरगो कमांड में भी धान की नर्सरी सूख रही है। फोटो जरगो मुख्य कैनाल की है। जिसमें तलहटी की काई सूखकर पपड़ी हो गई है। सावन में ऐसी स्थिति तो कभी न थी। जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को यह सामान्य बात भले लगे, लेकिन सच यह है कि सूखा के चलते किसानों की चमड़ी की भी पपड़ी इसी तरह से बन रही है।

जिले भर में अभी तक बारिश भले ही 30 फीसद से कम हुई हो, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में धान की रोपाई मिर्जापुर जनपद के सभी ब्लॉकों में 50 फीसद से ज्यादा हो गई है। जिला कृषि विभाग के आंकड़े के अनुसार अभी तक बारिश हुई है करीब 120 मिमी। होनी चाहिए थी करीब 450 मिमी।

झूठ या सच, आंकड़ा देखें फिर सोचें 

छानबे ब्लॉक में धान की रोपाई 90 फीसद, कोन में 95 फीसद, मझवां में 92 फीसद, पहाड़ी में 55 फीसद, नगर ब्लॉक में 60 फीसद, लालगंज व हलिया में 59 फीसद, मड़िहान में 58 फीसद, राजगढ़ में 60 फीसद, सीखड़ में  59 फीसद, नरायनपुर में 53 फीसद और जमालपुर ब्लॉक में 56 फीसद धान की रोपाई हो चुकी है। यह सरकारी आंकड़ा है। इसके अनुसार कुल मिलाकर जिले भर में 59 फीसद से ज्यादा धान की रोपाई हुई है।

जमालपुर ब्लॉक के भभौरा गांव से मिर्जापुर (वाया चुनार, मंगरहा, कछवा) तथा मिर्जापुर से भभौरा (वाया भरुहना, आमघाट, डगमगपुर, चुुनार, जमुई, सोनबरसा, श्रुतिहार, अदलहाट) तक धान के आच्छादन की स्थिति के लिए इस रिपोर्टर ने सोमवार 31 जुलाई को मोटरसाइकिल से भ्रमण किया। कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि 10 फीसद से ज्यादा धान की रोपाई हुई है। इस रास्ते में जमालपुर, नरायनपुर, मंझवा, सिटी, राजगढ़ ब्लॉक के कई गांव पड़ते हैं। धान की रोपाई को कौन कहे, नर्सरी ही नहीं बचाई जा पा रही है। खानजादीपुर और जमुहार के बीच में तो एक बूढ़ी अम्मा सूखी नर्सरी को उखाड़ने में जुटी थीं, ताकि उस खेत में कोई और फसल समय आने पर बोयी जा सके।

जरगो मेन कैनाल की स्थिति

सोनबरसा से जरगो मुख्य कैनाल के रास्ते पर दोनों तरफ स्थिति बहुत ही खराब है। दरअसल इस स्थिति से वहां के किसानों को पहली बार रूबरू होना पड़ रहा है। नल-जल योजना की कार्यदाई संस्था मेधा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की हठवादिता ही इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है। इसी कारण पहली बार इस कैनाल में पशुओं को भी पीने के लिए पानी नहीं है। तलहटी में जमी काई सूखकर पपड़ी बन गई है। सावन में यह स्थिति इससे पहले कभी न थी।

 

जिस नहर में वर्ष भर पानी रहता था, उसकी आज ऐसी स्थिति है कि इसके कमांड एरिया के किसान रो रहे हैं। जरगो कमांड के किसान पानी के मामले में इतना समृद्ध थे कि उनको कभी भी वैकल्पिक उपाय करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। किसी तरह से नर्सरी तो डाल लिया। अब उसे बचा नहीं पा रहे हैं। सड़क किनारे घर के उपयोग के लिए  जो सबमर्सिबल पंप लगे हैं, उनसे ही किसी तरह से नर्सरी की प्यास बुझाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह नाकाफी साबित हो रही है।

 

अधिकारी तो झूठे आंकड़े बना रहे, जनप्रतिनिधियों ने भी साधी चुप्पी

यह सही है कि मौसम पर किसी का वश नहीं है। प्रकति के आगे किसी की नहीं चलती। किसान परेशान हैं। वह अपने दर्द को सीने में दबाए हैं। कम से कम कोई जनप्रतिनिधि सहानुभूति के दो शब्द बोल देता तो उनका दर्द कुछ तो कम होता। ऐसा नहीं है कि नेता क्षेत्र में नहीं घूमते। घूमते हैं, लेकिन उनको न तो अहरौरा बांध पर जाने की फुर्सत है, न जरगो डैम पर। किसी वैकल्पिक उपाय पर पर भी किसानों के साथ चर्चा नहीं। किसान बहुत आशावादी होता है। वह उम्मीद में ही मिट्टी में पैसा बोता है और पसीने से सींचता है। यदि भविष्य में भी इस तरह की स्थिति होने पर क्या होगा, इसकी कोई योजना की घोषणा ही हो जाए, या आश्वासन ही मिल जाए तो किसानों की उम्मीद जिंदा रहेगी। ध्यान रहे कि जिस दिन किसान की उम्मीद मर जाएगी, वह भी जिंदा नहीं रहेगा। देश भर में किसानों की आत्महत्या की जो खबरें आती हैं, उनके मूल में उनकी उम्मीदों का मर जाना ही होता है। डीएम दिव्या मित्तल संवेदनशील अधिकारी हैं, सो किसानों के लिए राहत की बात जो है, वह उनकी ही सक्रियता है। भारतीय किसान यूनियन (लोकशक्ति) और भारतीय किसान यूनियन  के भी पदाधिकारी सक्रिय हैं।

 

 

बात अहरौरा कमांड की..

अहरौरा कमाड के किसान अपने साथ होने वाले सौतेले व्यवहार के अभ्यस्त हो चुके हैं। इसी कमांड में पड़ने वाले ओड़ी गांव के ही मूल निवासी स्वतंत्रदेव सिंह इस समय प्रदेश के सिंचाई मंत्री हैं। इस कमांड में बेलहर राजवाहा, बिकसी माइनर, शेरवा राजवाहा तथा चौकिया माइनर है। इनमें चौकिया माइनर के बारे में तो वर्षों से कहा जाता है कि जरूरत के समय यह काम नहीं आती। इस साल तो अहरौरा बांध में पानी ही नहीं है। 13-14 फीट पानी हो गया है, लेकिन वह इतना नहीं है कि नहरों को कुछ दिन के लिए ही सही, चलाया जाए।

पहली बार नर्सरी डालने के समय ही बोरिंग में लेयर नहीं रहा

इस साल पहली बार ऐसा हुआ है कि धान की नर्सरी डालने के समय ही बोरिंग में पानी का लेयर इतना नीचे चला गया था कि मोनोब्लॉक या डीजल पंपसेट से पानी नहीं निकाला जा सका। जिसके बोरिंग में सबमर्सिबल पंप है, वही धान की नर्सरी को जिंदा रखने में कामयाब हो सका। वही कुछ रोपाई भी कर पा रहा है।

बोले किसान…

ढेबरा के किसान पूर्व प्रधान रामआसरे सिंह ने बताया कि उनकी उम्र 65 वर्ष से ज्यादा होने वाली है। उन्होंने ऐसा सूखा नहीं देखा। मुड़हुआ के किसान बच्चा दुबे, मनऊर के गोपाल सिंह, लोढ़वा के अर्जुन सिंह, चरगोड़ा के महेंद्रनाथ सिंह सहित क्षेत्र के कई किसानों ने कहा कि इतना बड़ा सूखा तो कभी नहीं पड़ा कि धान की नर्सरी के समय ही भूगर्भ जल स्तर हद से ज्यादा नीचे चला गया। अभी क्या है। एक माह ही ऐसी स्थिति रही तो पीने के लिए भी पानी नहीं मिलेगा।

 

 


Sachchi Baten

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