July 23, 2024 |

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तालियों की गड़गड़ाहट से खुश न हों व्यवस्था परिवर्तन के स्वयंभू नायक, तालियां तो मदारी को भी मिलती हैं

Sachchi Baten

सर्कस के जोकर का क्रान्तिकारी पैगाम

 

आचार्य निरंजन सिन्हा

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आजकल भारत में अधिकांश तथाकथित क्रान्तिकारी नेतागण, या यूं कहें कि सभी तथाकथित क्रान्तिकारी नेताओं की हालत देख कर सर्कस के कलाकार याद आ जाते हैं। या स्पष्ट कहूँ, तो सर्कस के जोकर ही याद आ जाते हैं। इनको ‘व्यक्ति परिवर्तन’ और ‘व्यवस्था परिवर्तन’ में कोई मौलिक अंतर समझ में आता है, या नहीं, यह वही जानें। परन्तु दिखता तो यही है कि वे ‘व्यक्ति परिवर्तन’ को ही ‘व्यवस्था परिवर्तन’ समझते हैं। यानि इन्हें इन दोनों अवधारणाओं में कोई फर्क समझ में नहीं आता।

ऐसा कहने का आधार यह है कि जिनको ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की ‘क्रियाविधि’ (Mechanism) समझ में आती है, उनके पास उससे संबंधित कोई स्पष्ट ‘अवधारणा’ (Concept) होती है। भले ही उनकी रणनीति गुप्त रहे। ऐसी अवधारणाओं का एक स्पष्ट ‘दर्शन’ (Philosophy) होता है, जिसे बहुत ही कम लोग समझ पाते हैं। लेकिन एक स्पष्ट दर्शन तो होता ही है। ‘व्यक्ति परिवर्तन’ करने वाले ज्यादा से ज्यादा ‘दशकों की राजनीति’ करते हैं, या करना चाहते हैं। लेकिन ‘व्यवस्था परिवर्तन’ करने वाले अधिकतर ‘सदियों की राजनीति’ करते हैं, या करना चाहते हैं। लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन तो संस्कृति के परिवर्तन से ही होता है। महान क्रांतिकारी माओ त्से तुंग । महान क्रांतिकारी माओ त्से तुंग ने पहले माना था कि सत्ता बन्दूक की नली से मिलती है, लेकिन बाद में उन्हें भी यह समझ में आ गया कि व्यवस्था में परिवर्तन के लिए संस्कृति को ही बदलने की आवश्यकता होती है। इसलिए इनके द्वारा की गई सांस्कृतिक क्रांति ही आज़ चीन को वैश्विक स्तर पर ले आ सकी।

लेकिन इस ‘सांस्कृतिक क्रांति ‘के संदर्भ में व्यवस्था परिवर्तन’ शब्द या अवधारणा उचित नहीं है, इसके लिए तो उपयुक्त शब्द या अवधारणा ‘व्यवस्था का रूपांतरण’ (Transformation of System) होना चाहिए। दरअसल स्थायी और संरचनात्मक परिवर्तन के लिए ही ‘रूपान्तरण’ अवधारणा ही उपयुक्त है।

हालाँकि अब सर्कस प्रतिबंधित हो गया है, लेकिन जिन्होने सर्कस देखा है, उन्हें सर्कस के जोकर और कलाकार खूब याद होंगे। जिन्होंने सर्कस नहीं देखा है, या उनको देखने का अवसर नहीं मिला है, उन्हें प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर द्वारा अभिनीत ऐतिहासिक फिल्म “मेरा नाम जोकर” अवश्य देखनी चाहिए। वैसे यह फिल्म ‘मानवीय जीवन मूल्यों एवं भावनाओं’ को उकेरती और अभिव्यक्त करती एक महान फिल्म है, लेकिन मेरा अनुरोध है कि उनके कलाकारों और उनके जोकर (अभिनेता राजकपूर जी) की स्थितियों  एवं परिस्थितियों का ध्यान से अवलोकन करेंगे, तो आपको हमारे तथाकथित क्रान्तिकारी नेताओं की हरकतों को समझने का अवसर मिलेगा।

इन सर्कसों के जोकर एवं कलाकार को उसी सर्कस के ढाँचे (Framework) में, उसी बनावट (Structure) में एवं उन्हीं की नीतियों के अनुरूप ही अपनी कलाकारी दिखाना होती है, उसके बाहर नहीं। इसीलिए उन्हें पहले से ही प्रायोजित तरीके से ही कार्य करना होता है, या कर पाते हैं। इसी कारण वे सर्कस के प्रायोजित साफ्टवेयर में फिट होकर प्रायोजक की प्रयोजना के ही अनुरूप ही ‘शो’ करते हैं। यही हालत हमारे तथाकथित क्रान्तिकारी कलाकारों की है।

वे भी उन्हीं के चक्रव्यूह में, जिनके विरुद्ध ये दिखते हैं, बड़े प्रक्रम से एवं बड़ी सूक्ष्मता और गहराई से उन्हीं के पक्ष में कलाकारी दिखाने में लगे रहेंगे। उन्ही के साहित्य एवं ग्रन्थ को पढ़ कर और उसे ही अकाट्य सत्य एवं सही मानेंगे। यानि ये जोकर उसी ढाँचे एवं व्यवस्था में और उन्हीं की नीतियों के अनुरूप तैरते एवं उड़ते रहेंगे। कलाकारी करते रहेंगे। और ये इस काल्पनिक अहसास में भी रहेंगे कि ये अब क्रान्तिकारी विजय पाने ही वाले हैं। इन्हें ऐसा इसलिए भी लगता है, क्योंकि इनको यथास्थितिवादियों के मैदान की गहरी प्रोग्रामिंग की समझ ही नहीं होती है|

ये सिर्फ अपनी डफली ज़ोर ज़ोर से पीटते हैं, गला फाड़ फाड़ कर चीखते चिल्लाते भी हैं, और अपना सिर नीचे एवं पैर ऊपर कर सारी धरती का बोझ अपने सिर पर रख लेने का दावा भी करते हैं। आप भी ऐसे चीखते -चिल्लाते और गला फाड़ते नेताओं को याद कर सकते हैं, यानि ध्यान में ला सकते हैं। जोकर के इस आकर्षक प्रदर्शन का तालियों की गड़गड़ाहट से खूब स्वागत होता है। इसी तरह ये नेताजी भी तालियों की गड़गड़ाहट से ही बहुत खुश हो जाते हैं।

लेकिन तालियों की गड़गड़ाहट सुनने को बेकरार नेतागण, या तालियों की गड़गड़ाहट सुन कर अति प्रसन्न होने वाले क्रान्तिकारी नेतागण यह भी याद रखें कि ऐसी ही गड़गड़ाहट मदारी को भी मिलती हैं। फिर इन दोनों गड़गड़ाहट में अंतर वही जानें।

ध्यान रहे, गंभीर विमर्श में, या गंभीर चिंतन में तो सन्नाटा छा जाता है। तो ये नेतागण गंभीर विमर्श या गंभीर चिंतन कर रहे होते हैं, या और कोई खेल दिखा रहे होते हैं, यह तो आप भी समझ रहे हैं।दरअसल गंभीर विमर्श या चिंतन गहरा अध्ययन और मनन मंथन चाहता है।

हार्वर्ड विश्विद्यालय के प्रसिद्ध प्रोफ़ेसर सैम्युल थामस कुहन अपनी पुस्तक – The Structure of Scientific Revolutions में कहते हैं कि हर क्रान्ति की मूल बुनियाद विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट (Paradigm Shift) है| और यह विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट सन्दर्भ, या परिस्थिति, या संरचना, या बनावट में मूलभूत बदलाव से ही आ सकता है। यह पैरेडाईम शिफ्ट उसी ढाँचे में रहकर, या उसी सन्दर्भ, या परिस्थिति, या संरचना, या बनावट में रह कर नहीं हो सकता। लेकिन ये तथाकथित क्रान्तिकारी नेता इसे समझते ही नहीं है, या समझना ही नहीं चाहते, या इसे समझने की उनमें कोई योग्यता एवं स्तर ही नहीं होता है। चूँकि ये नेता तथाकथित क्रान्तिकारी माने जाते हैं, और इसीलिए इन्हें “थके” हुए, या “पके” हुए, या “बिके” हुए कहने में भी डर लगता है।

                                                                            आचार्य निरंजन सिन्हा 

(लेखक राज्य कर संयुक्त आयुक्त बिहार पटना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त हैं । इनके अन्य पोस्ट https://niranjan2020.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं)


Sachchi Baten

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