July 19, 2024 |

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कोरोना को हराया, अब ईंट भट्ठों पर बचपन को गढ़ कर बना रहे इंसान

Sachchi Baten

प्रेरक स्टोरी

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गरीबों की झोपड़ी को शिक्षा से रौशन कर रहे अमित व लालमनी

-ईंट भट्ठों पर काम कर रहे मजदूरों के बच्चों को नियमित पढ़ाता है यह दंपती

-घर के खर्च के लिए करते हैं खेती, सामाजिक जागरूकता वाले गानों का भी देते हैं प्रशिक्षण

राजेश पटेल, आराजीलाइन/बनारस (सच्ची बातें)। कोविड 2019 ने लाखों लोगों से उनकी खुशियां छीन लीं। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनको इसी कोविड ने नई राह दिखाई। कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि कोविड ने जीवन जीने का तरीका बता दिया था। वाराणसी जिले के आराजीलाइन ब्लॉक के चक्रपानपुर ग्राम पंचायत के कोसड़ा गांव निवासी अमित राजभर के जीवन में अचानक ऐसा बदलाव आया कि उन्होंने अपनी प्राइवेट नौकरी छोड़कर गरीबों के घरों को शिक्षा की रौशनी से रौशन करने की ठान ली। इस कार्य में उनकी पत्नी लालमनी देवी बराबर सहयोग देती हैं।

सबसे पहले अमित राजभर के बारे में। इनके पिता साधारण किसान थे। अमित ने किसी तरह से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद मन मसोसकर पढ़ाई छोड़नी पड़ी। घर चलाने के लिए एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगे।

स्कूल के बाद खेती के काम में हाथ बंटाते थे। संगीत में रुचि भी आय का जरिया है। ये सामाजिक जागरूकता के गाने गाते हैं। हारमोनियम व गिटार बजाते हैं। गानों का प्रशिक्षण भी समय-समय पर कुछ लोग लेते हैं। इसके एवज में गुरुदक्षिणा के रूप में कुछ मिल जाता है।

 

इसी दौरान शादी हो गई। दो बच्चे भी हो गए। गृहस्थी चल रही थी, लेकिन कोविड 2019 में कोरोना के शिकार हो गए। लगा कि अब मौत निश्चित है। कमाने-खाने के अलावा जीवन में और कुछ किया ही नहीं। धिक्कार है ऐसी जिंदगी को। लेकिन नियति को तो उनके हाथों हजारों गरीब बच्चों की तकदीर लिखवानी थी, सो बच गए।

स्वस्थ होते ही अपनी प्राइवेट नौकरी को छोड़ दिया तथा गांव के पास ही स्थित एक ईंट भट्टे पर जाकर वहां के मजदूरों के बच्चों को एकत्र करके पढ़ाना शुरू किया। इससे जो खुशी मिल रही थी, अमित उसे शब्दों में बयां नहीं कर पा रहे। पति की खुशी को ही पत्नी लालमनी ने भी अपनी खुशी मान ली। घर के कामों से निवृत्त होने के बाद वह भी ईंट भट्ठों पर जाकर वहां काम कर रहे लोगों के बच्चों को पढ़ाने लगी।

इनके कार्य को देखकर एक स्वयंसेवी संस्था ने मदद भी करनी शुरू कर दी। उसकी मदद से इस समय आठ भट्ठों पर मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने का केंद्र चल रहा है। करीब ढाई सौ बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।

भट्ठों पर मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने के साथ खेल-कूद भी सिखाया जाता है। नैतिक शिक्षा दी जाती है। सफाई पर ध्यान देने को कहा जाता है। दोस्तों से मदद लेकर इन बच्चों के लिए समय-समय पर कपड़ों की व्यवस्था की जाती है।

इसके अलावा एक सिलाई प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित किया जा रहा है। दो सौ किशोरियों का एक संगठन बनाया है, इसके माध्यम से किशोर होती बच्चियों को शारीरिक बदलाव व इस दौरान सफाई के साथ अन्य बातों की सीख अमित की पत्नी लालमनी देती हैं। अमित कहते हैं कि जब तक एक भी बच्चा पढ़ाई से वंचित रहता है, तब तक देश को विकसित नहीं कहा जा सकता है। विकसित भारत बनाने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। इसके लिए वह तथा उनकी पत्नी हर संभव प्रयास में हैं।

 

 


Sachchi Baten

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