July 23, 2024 |

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लोकतंत्र का प्रजातंत्र में बदलना भारत के लिए घातक

Sachchi Baten

जानिए सरदार पटेल के ‘सरदारवाद’ को

सरदारवाद’ महान राष्ट्रनायक सरदार वल्लभभाई  पटेल का भारत के प्रति दर्शन का सार (Essence of the Philosophy) है। उन्होंने  ‘देश’ (Country) को,  ‘राज्य’ (State) को और  ‘राष्ट्र’ (Nation) को बहुत अच्छी तरह से समझा। उन्होंने भारत देश’ को मजबूत करने के लिए उसका भौगोलिक एकीकरण’ किया। उन्होंने भारत राज्य’ को मजबूत करने के लिए संप्रभुता’ (Soverinity) की महत्ता समझकर आर्थिक सशक्तीकरण’ का आधार तैयार किया। भारत के राष्ट्र’ निर्माण के संदर्भ में इनका नजरिया विघटनकारी तत्वों के प्रति बहुत सख्त था।

उन्होंने भारत में लोकतंत्र’ (Democracy) और गणतंत्र’ (Republic) को सशक्त एवं समृद्ध बनाने के लिए आजादी के बाद शुरुआती कदम उठाया ही थाकि उन्हें इस दुनिया से ही विदा होना पड़ा. आज भारत में लोकतंत्र’ का सफ़र प्रजातंत्र’ की ओर बढ़ रहा हैजो राष्ट्र के लिए घातक है। ध्यान रहे कि लोकतंत्र’ में सभी तंत्रों की निष्ठा आम लोगों’ के प्रति होती हैऔर यह संविधान’ के माध्यम से अभिव्यक्त होती है, जबकि प्रजातंत्र’ में सभी तंत्रों की निष्ठा राजा’ के प्रति होती हैजो समाज के कुछ खास वर्गों द्वारा घिरा होता हैऔर उन खास वर्गों के हितों की रक्षा को सामान्य प्रजा के हितों पर सदैव वरीयता देता है। प्रजा (Subject) का तंत्र वहीं होता हैजहाँ शासन का प्राधिकार राजा में होता है।अब सरदारवाद’ को विस्तार से समझा जाय।

आज हम लोग भारत के राष्ट्र नियामक सरदार बल्लभभाई पटेल के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे। वे भारत के प्रथम उप प्रधान मंत्री एवं प्रथम गृह मंत्री भी हुए। इनका नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में खेड़ा आन्दोलन एवं बारदोली सत्याग्रह के प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में भी लिया जाता है। रियासत मंत्री के रूप में उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारत की कुल 565 रियासतों में से तीन रियासतों को छोड़कर  सभी छोटी-बड़ी 562 रियासतों का विलीनीकरण (Assimilation) भारत में कर दिया। यह संभवतः विश्व इतिहास में सबसे अनूठा उदाहरण हैजहां इतने अल्प समय में,  इतने विशाल स्तर के भौगौलिक एवं राजनीतिक एकीकरण को सफलतापूर्वक संभव कर दिया गया। विलय की गयी रियासतों का यह इलाका कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 40% के बराबर था।स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तीन बची हुई रियासतों में से हैदराबाद एवं जूनागढ़ रियासत का विलीनीकरण उन्होंने देश के प्रथम गृह मंत्री के रूप में किया। तीसरी रियासत जम्मू कश्मीर‘ के मामले को तत्कालीन प्रधान मंत्री द्वारा अपने हाथ में ले लेने के कारण ही उसकी दुर्दशा हुईजिसे  हर भारतीय जानता हैऔर जो आज भी भारत की एकताअखंडता एवं आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर समस्या बना हुआ है। गोवा (भारत भूमि पर पुर्तगाली उपनिवेश) जैसे अन्य साम्राज्यवादी उपनिवेशों का भारत में विलीनीकरण का मामला भी इनके दृष्टिकोण में स्पष्ट एवं राष्ट्र अभिमुख थापरन्तु तत्कालीन नेतृत्व की असहमति के कारण इन सबका विलीनीकरण बहुत बाद में सम्भव हो सका। देश की एकता-अखंडता  एवं उसके एकीकरण के प्रति उनके इन्हीं दृढसख्त एवं स्पष्ट रुख  के कारण ही उन्हें भारतीय इतिहास में लौह पुरुष” के नाम से जाना जाता है।

इस भौगोलिक एकीकरण के कई निहितार्थ हैं, जिसे स्थिरता के साथ समझा जाना चाहिए।इससे भारत अपने कई पड़ोसी देशों से उलझने से बच गयाजिसने कई फ्रन्ट पर सैन्य खर्च को बचा लिया। इस एकीकरण से पांच सौ पड़ोसी देशों से राजनयिक सम्बन्ध बनाना और उसे सम्हालना एक अतिरिक्त प्रयास होता। इस भौगोलिक एकीकरण ने आर्थिक समृद्धि को मजबूत आधार दियाजो विस्तृत रेलसड़कबाँध व जलाशयसंचारबिजली आदि के रूप मे कई अन्य अवसर राष्ट्र को दिया। आप इसे जर्मनी एवं इटली के एकीकरण और उसकी उभरती सैन्य शक्ति के रूप में समझ सकते हैं।

सरदार पटेल एक बहुत ही तीक्ष्ण एवं कुशाग्र बुद्धि के रणनीतिकारबैरिस्टर एवं राजनेता थे।यदि स्पष्ट रूप से देखा जाय तो बहुमत इस स्पष्ट मत के पक्ष में है कि इनकी वकालत नेहरू की अपेक्षा ज्यादा चलती थीयानि ये नेहरू की अपेक्षा ज्यादा  व्यावहारिकलोकप्रियसमझदारसमर्पितसमानुभूति (Empathy) रखने वाले  एवं कुशल रणनीतिकारबैरिस्टर एवं राजनेता थे। ‘सार्वजानिक पद’ (Public Post) इनकी प्राथमिकता में कभी नहीं रहाबल्कि जनता’ एवं राष्ट्र’ ही सदैव इनकी प्रथम वरीयता में  रहे। इसीलिए इन्होने सदैव ही देश की  ‘जनता’ एवं राष्ट्र’ के हित में पदों को कभी महत्व नहीं दिया। इसी कारण जनता’ एवं राष्ट्र’ के लिए सर्वथा उपयुक्त होते हुए भी शासन का नेतृत्व’ दूसरे के हाथों में दिए जाने में इन्होंने कभी आपत्ति नहीं की। नेहरू देश के शासन प्रमुख हो गएजबकि पटेल सबसे ज्यादा उपयुक्त थे। इसे उस समय की स्थितियों एवं परिस्थितियों को समझने से स्पष्ट होगा।

यदि हम उपनिवेशवाद (Colonialism) एवं साम्राज्यवाद (Imperialism) की अवधारणाउनकी क्रिया विधियों एवं उनकी विभिन्न अवस्थाओं को समझ जाते हैंतो हम महानायक सरदार पटेल की राष्ट्र के प्रति उनकी महत्वपूर्ण भूमिका एवं लक्ष्य को आसानी से समझ  सकते हैं। उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद दोनों में आर्थिकसामरिक एवं राजनीतिक हितों यानि स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरों के क्षेत्रों पर आधिपत्य जमाया जाता है। उपनिवेशवाद में आधिपत्य भौतिक रूप में स्पष्ट एवं दृश्य होता हैक्योंकि उपनिवेशवादी राष्ट्र’ वहां स्वयं उपस्थित होता है। यानि उपनिवेशवादी राष्ट्र’ अपने उपनिवेश में उसके शासन व्यवस्थाअर्थ व्यवस्थापुलिस व्यवस्था एवं सैन्य व्यवस्था को अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखता है। जबकि साम्राज्यवाद में ऐसा आवश्यक नहीं हैअर्थात  साम्राज्यवाद की बदलती अवस्था के अनुरूप इसका  स्वरूप एवं प्रकृति बदलती रहती है। इसके लिए यानि साम्राज्यवाद के लिए साम्राज्यवादी देश को उस नियंत्रित देश की शासन व्यवस्थाअर्थ व्यवस्थापुलिस व्यवस्था एवं सैन्य व्यवस्था को प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखने की बाध्यता नहीं होती है। 

उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद दोनों की क्रियाविधिप्रसार एवं समापन अलग अलग तरीकों से होता रहा। इसीलिए यूरोपीय देशों का अफ्रीकाआस्ट्रेलेशिया (आस्ट्रेलिया एवं अन्य) एवं अमेरिकी महाद्वीप में पहले उपनिवेशवाद स्थापित हुआ और एशिया एवं भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में पहले साम्राज्यवाद स्थापित हुआ। भारत में पहले साम्राज्यवाद का प्राथमिक स्वरूप आयाफिर उपनिवेशवाद के साथ- साथ साम्राज्यवाद का दूसरा स्वरूप आया। द्वितीय युद्ध के बाद साम्राज्यवाद के तीसरे स्वरूप के अनिवार्य स्वरूप का अवतार हुआ और इसके साथ उपनिवेशवाद की आवश्यकता नहीं थी। उपनिवेशवाद या तो पूर्णतया उपस्थित रहाया स्पष्टतया अपने वजूद में ही नहीं रहापरन्तु इसके परिवर्तित मौलिक स्वरूप का उदाहरण नहीं मिलता है।

साम्राज्यवाद के प्रथम चरण में मैं ‘वणिक साम्राज्यवाद’ (Mercantile Imperialism) को रखता हूँजिसमें सामानों की खरीद एक स्थान से करकेदूसरे स्थान पर उसकी बिक्री की जाती रहीऔर लाभ प्राप्त किया जाता रहा। इस अवस्था में साम्राज्यवादियों को सिर्फ इसी स्वतन्त्रता की आवश्यकता थीयानि सिर्फ व्यापार करने की स्वतंत्रता एवं एकाधिकार की ही आवश्यकता रही। जब तक आवश्यक नहीं होस्थानीय शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप भी नहीं किया जाना इसकी अलग विशिष्टता रही।

लेकिन यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति की आवश्यकताओं ने साम्राज्यवाद की दूसरी अवस्था को ला दियाजिसे ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद‘ (Industrial Imperialismकहा गया। इसमें उद्योगों के लिए कच्चा माल (Raw Material) का स्रोतमशीन चलाने के लिए ईंधन (Fuel) एवं उत्पादित माल के लिए बाजार की आवश्यकता हो गई। इसने उपनिवेशों  की स्थापना की अतिरिक्त आवश्यकता को जन्म दे दिया। इस तरह उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद दोनों की मौजूदगी एक साथ हो गई। 

लेकिन साम्राज्यवादी हितों के लिए हुए विश्व युद्धों ने इसके इस संयुक्त स्वरूप को भी नष्ट कर दिया। मतलब यह कि अब उपनिवेशवाद की आवश्यकता नहीं रह गई थीक्योंकि औद्योगिक साम्राज्यवाद’ भी अब वित्तीय साम्राज्यवाद’ (Financial Imperialism) में बदल गया। वित्तीय साम्राज्यवाद में साम्राज्यवादियों की प्राथमिकता सिर्फ अपने वित्तीय निवेश और उनके लाभों की सुरक्षा तक सीमित रही। इस स्वरूप को सरदार पटेल की तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता समझ रही थीऔर इसीलिए उन्होंने साम्राज्यवादियों द्वारा जानबूझकर रियासतों को दी गई स्वतंत्रता की मंशा को भांप लिया था।

हमलोग आर्थिक शक्तियों के इस स्वरूप और क्रिया विधि को नहीं समझना चाहतेपरन्तु इस शक्तिशाली क्रिया-विधि एवं स्वरूप को समझना आवश्यक है। यह सब कुछ उत्पादन (Production), वितरण (Distribution), विनिमय (Exchange) एवं संचार (Communication) की शक्तियों एवं उनके अंतर्संबंधों के द्वारा संचालितनियंत्रितनियमित एवं प्रभावित होता है। यह भी सही हैकि प्रत्येक देशों के स्वतन्त्रता संग्राम ने इन साम्राज्यवादी देशों पर अतिरिक्त दबाव बनायापरन्तु वित्तीय साम्राज्यवाद की प्रमुख एवं महत्वपूर्ण भूमिका की उपेक्षा करना स्पष्टतया नादानी’ है।उपनिवेशवाद के समाप्त होने को साम्राज्यवाद की समाप्ति समझ लेना किसी का भोलापन’ हो सकता है। लेकिन यह सब सरदार पटेल समझते थेऔर इसी कारण उनको नेतृत्व सौंपने में बहानेबाजी  की गई। इस बहानेबाजी में साम्राज्यवादियों ने भी सफल खेल खेला।

कुछ भारतीय राजनेताओं ने व्यक्तिगत पदों को बहुत ज्यादा महत्व दियाऔर उनकी तथाकथित नादानी से साम्राज्यवादियों को कतिपय महत्वपूर्ण सफलता मिल ही गयी। भारत माता को खंडित कर दिया गयाऔर उसके दुष्प्रभाव अभी तक  स्वतंत्र भारत में चारो तरफ जारी हैं। फिर भी पटेल ने साम्राज्यवादियों के एक महत्वपूर्ण मंसूबे को ध्वस्त कर ही दियाजो 562 रियासतों के विलीनीकरण के रूप में सम्पन्न हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद समाप्त हो गया और तत्कालीन साम्राज्यवाद पूरी तरह से वित्तीय साम्राज्यवाद” में बदल गया। सरदार पटेल की उत्तरजीविता (Continuity) भारतीय राष्ट्र का कुछ दूसरा ही स्वरूप प्रस्तुत करतीजो उनके अल्प अवधि के कार्यकाल में संभव एवं दृष्टिगोचर नहीं हो सका।

साम्राज्यवादियों का वित्तीय निवेश (Financial Investment) इस देश में सुरक्षित हो गया। अब तो यह भी आरोप लगाए जाते हैंकि देश की संप्रभुता अनेक समझौतोंसंगठनों एवं शर्तों में दब गयी है। साम्राज्यवाद (सूचना यानि डाटा साम्राज्यवाद) के बदलते स्वरूप में आज देश के शासनाध्यक्ष (Head of the Government) मात्र अपने देश का प्रबंधक (Manager) साबित हो रहे हैं। सरदार पटेल इस भूमिका को बर्दाश्त नहीं कर सकते थेऔर शायद इसी पूर्वाभास ने उन्हें आन्तरिक’ रूप से तोड़ दिया या इसी तरह का कोई अन्य कारक उन पर हावी हो गयाजो अनुसंधान का विषय हो सकता है।

सरदार पटेल ने भारत जैसे एक परम्परागत देश‘ (Traditional Country) कोजो अनेक अलग-अलग देशों का एक  वृहत् देश समूह’ थाउसे एक सशक्त राष्ट्र (Union of Nations) में बदलने का सफल प्रयास किया। हालाँकि शुरुआती अवस्था में ही सरदार का महाप्रस्थान देशराष्ट्र एवं मानवता को अपूर्णीय क्षति दे दिया। एक सशक्त देश एवं राष्ट्र की पहली मौलिक एवं प्राथमिक शर्त भौगोलिक एकीकरण होती हैजिसे इन्होंने बखूबी निभाया। हमें ज्ञात होना चाहिए कि एक भौगोलिक अस्तित्व में ही कोई वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विकास हो सकता है। एक सशक्त राष्ट्र में आपसी घृणा एवं हिंसा को जड़ से समाप्त” (Root out hate and violence) करने के लिए ही 1948 में  उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबन्ध लगा दिया। यही इनकी राष्ट्र’ के प्रति चिंता एवं अवधारणा को स्पष्ट करता है। वास्तव में किसी भी समझदारसंपन्न एवं सशक्त राष्ट्र में आपसी घृणा एवं हिंसा’ को कोई स्थान नहीं मिल सकता। ऐसे ही संकट के समय में हर समझदार नागरिक को सरदार याद आते हैं।

ऐतिहासिक एकत्व की भावना से संगठित समाज ही एक राष्ट्र कहलाता है। उस समय कृषक एवं कृषि ही राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण थेऔर सरदार का पूरा ध्यानविश्वास एवं समानुभूति (Empathy) कृषकों के लिए रहा। कृषक ही उस समय देश की मुख्य जनसंख्या थीयही मुख्य अर्थव्यवस्था थीयही राष्ट्रीय शक्ति थीयही समय की समझदारी थीयही विकास का तकाजा थायही सम्पन्नता का मूल मंत्र था और यही राष्ट्रवाद था। लेकिन अब इस राष्ट्रवाद की अवधारणा ही बदल दी गई है। अब तो राष्ट्रवाद का खतरनाक दुरुपयोग भी किया जाता है। अब तो यह आरोप लगाया जाता है कि जब जनमत रोटी मांगता हैरोजगार मांगता हैशिक्षा और चिकित्सा मांगता हैतो  उसे राष्ट्रवाद’ (Nationalism) की नशीली दवा पिलाई जाती हैऔर उसे होश में नहीं रहने दिया जाता है। अब तो राष्ट्रवाद की नव-परिभाषा संकीर्ण सम्प्रदायवादवेशभूषाखानपान एवं नाम के स्वरूपों में सिमट गई है। सरदार शायद कुछ दिन और रहते या सरदार ही राष्ट्र की प्रमुख भूमिका में होतेतो शायद यह राष्ट्र अपने प्राचीन गौरव के साथ ही आज विश्व व्यवस्था (World Order) में पहले स्थान पर होता। अपने वर्तमान सुपर पड़ोसी (Super neighbour)’ चीन (अब दुनिया की एक सामाजिकआर्थिकसांस्कृतिकराजनीतिकवैज्ञानिक एवं सैन्य महाशक्ति) के संदर्भ में आज हम इस बात को भली-भांति समझ सकते हैं।

सरदार पटेल के सरदारवाद’ को आज समेकित रूप में समझना आवश्यक है।यह अवधारणा’ भारत को सशक्तसमृद्ध एवं अग्रणी बना सकता हैयदि इस सरदारवाद’ को सम्यक ढंग से समझकर अनुपालित किया जाय। सरदार पटेल भारत देशराज्य और राष्ट्र को सम्पूर्ण विश्व में भारत को ही “सरदार” बना देना चाहते थे। ऐसी ही स्थितियों और परिस्थितियों में महामानवलौह पुरुष सरदार पटेल सदैव याद आते हैं।

-निरंजन सिन्हा 

स्वैच्छिक सेवानिवृत्तराज्य कर संयुक्त आयुक्तबिहारपटना।


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