July 24, 2024 |

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कांग्रेस का ओबीसी कार्ड: 5 राज्यों के आगामी चुनाव में बैकफुट पर बीजेपी

Sachchi Baten

अतीत की गलतियों से उबरने का प्रयास कर रही कांग्रेस

 

कुमार दुर्गेश

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देश के पांच राज्यों तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान छत्तीसगढ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है। जिनमें हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ओबीसी मुख्यमंत्री हैं। तेलंगाना सीएम के. चंद्रशेखर राव सामान्य वर्ग की कृषक वेलम्मा जाति से हैं। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों में अशोक गहलोत, के. चंद्रशेखर राव, शिवराज सिंह चौहान में एक बात सामान्य है कि इन मुख्यमंत्रियों की जातियों की आबादी अपने-अपने राज्यों में काफी कम है।

इधर बिहार में जाति आधारित सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद कई प्रकार के सवाल तैर रहे हैं। ओबीसी के अधिकारों के बहस की बात से ही बीजेपी के एजेंडे को नुकसान पहुंच जाता है। बीजेपी जहां धार्मिक बहुसंख्यक आधारित राजनीति की बात करती है, जिसकी काट बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के बीच ही है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक कम जनसंख्या वाली जातियों के नेता सर्वाधिक पसंद किए जा रहे हैं। बिहार में नीतीश, ओडिशा में नवीन पटनायक, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, तमिलनाडु में स्टालिन इसके उदाहरण हैं। ऐसे में जातीय गणना को लेकर बीजेपी जो जात-पात बढ़ने, कम आबादी वाली जातियों को राजनीतिक रूप से भयाक्रांत करने का जो राग अलाप रही है, उसे ये तथ्य बेसुरा साबित करते हैं।

हालांकि ऐसी एक मान्यता रही है कि बीजेपी बहुसंख्यक आबादी के वर्चस्व के बहाने एक खास जातीय समूह के हितों की हिफाजत करने वाली पार्टी है। मोटे तौर पर इसे ब्राह्मण-बनिया नेक्सस की परिणिति के तौर भी पर देखा जाता रहा है, जो बाद में हिंदुत्ववादी पार्टी के आवरण में आ जाती है। किंतु बहुसंख्यक हिंदुओं के भीतर जातियों की जो संरचना है, उसमें कम संख्या वाली जातियों के नेता की स्वीकार्यता ज्यादा होना अपने आप में बीजेपी को चिढ़ाते हैं। मौजूदा समय में ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाले अधिकांश मुख्यमंत्री भी अपने-अपने राज्यों में जातीय आधार पर कम संख्या वाली जाति से आते हैं।

इसी बीच कांग्रेस खुल कर ओबीसी कार्ड खेल रही है। राहुल गांधी जिस आक्रामकता से ओबीसी को लेकर तथ्यात्मक सवाल उठा रहे हैं वैसा हाल फिलहाल में कोई ओबीसी जातियों का नेता भी नहीं उठा पाया है। राहुल गांधी की आक्रामकता से प्रतीत होता है कि कांग्रेस अपनी अतीत की गलतियों से उबरने का प्रयास कर रही है। साथ ही कांग्रेस को नरेंद्र मोदी के खिलाफ ओबीसी की संभावित एकजुटता का एहसास हो चुका है। केन्द्रीय विभाग में 89 सचिवों में मात्र 03 ओबीसी होने से जुड़े राहुल गांधी के सवालों पर अमित शाह की ओबीसी सांसद होने की थोथी दलीलें जनमानस पर शायद ही कोई प्रभाव डाल सकें। ऐसे में बीजेपी को अगले पांच राज्यों के चुनाव में कुछ ठोस सबूत पेश करना चाहिए, जिससे कि वह ओबीसी हित का ध्यान रखने वाली पार्टी के रूप में दिखाई दे। हालांकि इसकी संभावना कम है। फिर भी कौन कितना ओबीसी को लेकर गंभीर है, इसका आकलन करने के लिए यह चुनाव ज्वलंत उदाहरण होगा।

किंतु यह लगभग तय हो चुका है 90 विधानसभा सीटों वाली छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और 200 विधानसभा राजस्थान में अशोक गहलोत के खिलाफ बीजेपी के दोनों सीएम कैंडिडेट अगड़ी जाति से होंगे। चूंकि 230 विधानसभा सीटों वाली मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की वापसी मुश्किल लग रही है। ऐसी स्थिति को भांप कर ही बीजेपी ने अगड़ी जाति से सीएम का विकल्प खुला रखा है। यदि बीजेपी सरकार बना भी लेती है तो शिवराज सीएम नहीं बनेंगे, यह सुनिश्चित करने के लिए बीजेपी ने टिकट बंटवारा में ही इशारा कर दिया है। मध्य प्रदेश के सीएम की रेस में शिवराज जो ओबीसी की किरार जाति से आते हैं, इन्हें किनारे कर नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा या कैलाश विजयवर्गीय को सीएम बनाया जा सकता है। चूंकि शिवराज लंबे समय से सीएम रहने, व्यापम घोटाले को लेकर सवालों के घेरे में रहने के साथ साथ ओबीसी आरक्षण पर आंदोलित पिछड़ों को निराश किए हैं, ऐसे में उनकी जमीन कमजोर हो चुकी है। जाहिर है कि बीजेपी जैसी पार्टी से और ज्यादा उम्मीद नहीं पाली जा सकती है कि वो बार बार पिछड़ी जाति से ही सीएम बनाए। शायद यहीं कारण है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी शिवराज के चेहरे पर नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव में उतरी है।

इन परिस्थितियों में साफ दिखाई देता है कि बीजेपी को हिंदी पट्टी में ओबीसी की अपेक्षा अगड़ी जातियों के नेतृत्व पर ज्यादा भरोसा है। ओबीसी समूह पर बीजेपी के इस अविश्वास के माहौल को भांपते हुए ही कांग्रेस ओबीसी कार्ड खेल रही है। यदि हिंदी पट्टी के इन तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी 3-0 से हारी तो कांग्रेस पहली बार अगड़ी जातियों के मोह से मुक्त होकर ओबीसी राजनीति का चैंपियन बनने की कोशिश करती हुई नजर आयेगी। अभी ओबीसी कार्ड पर राहुल गांधी मुखर है किंतु उनकी पार्टी कांग्रेस का जोश थोड़ा ठंडा दिखाई देता है।

 

-लेखक सामाजिक व राजनैतिक चिंतक हैं।


Sachchi Baten

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