July 24, 2024 |

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चुनाव से पहले ही यूपी में हार मान ली कांग्रेस नेतृत्व ने? पढ़ें विश्वेषण…

Sachchi Baten

सोनिया के राजस्थान से राज्यसभा में जाने की क्या है रणनीति?

Congress leadership accepted defeat in UP even before the elections? Read the investigation…

अब शायद ही उप्र से लोकसभा में बैठे ‘गाँधी परिवार’!

-प्रियंका का लड़ना तय नहीं, न्याय यात्रा के यूपी प्रवेश के ऐन समय हुईं बीमाऱ

-राहुल का अब अमेठी लौटना तय नहीं, वायनाड ही रहेगी उनकी लोस सीट!

-उत्तर भारत में अस्तित्व बचाने को सोनिया ने चुना राजस्थान

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। कांग्रेस में वास्तव में इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। न पार्टी के अंदर और न बाहर। राहुल गाँधी के नेतृत्व में चल रही भारत जोड़ो न्याय यात्रा के चंदौली के रास्ते उप्र में प्रवेश के पहले ही दिन पूर्व कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी के ‘रहस्यमयी’ रूप से बीमार होने ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या कांग्रेस में वाकई कुछ गड़बड़ चल रही है।

उधर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने भी रायबरेली से चुनाव लड़ने के बजाए राजस्थान से राज्यसभा जाने को तरजीह दी है। राहुल गाँधी 2019 में अमेठी से लोकसभा हार चुके हैं, लेकिन दोहरी प्रत्याशिता के चलते वे वायनाड से जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे। कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी खरगे के रूप में दक्षिण भारतीय है, जिससे यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि कांग्रेस उत्तर भारतीय राज्यों में अपनी पराजय क्या 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले ही स्वीकार कर चुकी है।

शायद इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए सोनिया गाँधी ने राज्यसभा जाने के लिए राजस्थान को चुना है। हालांकि उनके पास कांग्रेस शासित तेलंगाना से लोकसभा अथवा राज्यसभा में जाने का निमंत्रण था, किंतु संभवतः राहुल गांधी के केरल और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कर्नाटक से सांसद होने के चलते वे खुद कांग्रेस को उत्तर-दक्षिण की राजनीतिक बहस के केंद्र में नहीं लाना चाहती थीं।

फिर भी यह सवाल तो खड़ा ही है कि सोनिया गांधी आखिर रायबरेली की अपनी पारंपरिक लोकसभा सीट को छोड़कर क्यों चली गईं। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एकमात्र रायबरेली सीट थी, जो सोनिया के बूते कांग्रेस के लिए ‘विनिंग’ थी। इसीलिए राजनीतिक गलियारों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि अमेठी में 2019 के लोकसभा चुनाव की तरह 2024 में सोनिया गांधी को रायबरेली से भी अपनी हार नजर आ रही थी।

हाल में एक निजी सर्वेक्षण में यह सामने आया कि कांग्रेस के लिए रायबरेली में जीत की संभावना मात्र 45 फीसदी है। तो क्या इसी कारण सोनिया गांधी ने रायबरेली से पलायन का मार्ग चुना अथवा असल बात कुछ और है! देखा जाए तो सोनिया गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व सँभालते ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को उनके सामान के साथ कांग्रेस कार्यालय से निकाल दिया गया था और पार्टी की कमान अपने हाथों में ले ली थी।

सोनिया के नेतृत्व के बल पर न केवल कांग्रेस मजबूत हुई, वरन अटल-आडवाणी की भगवा आंधी के सामने डट कर खड़ी भी रही। कांग्रेस ने सोनिया की इच्छाशक्ति के सहारे ही 10 साल देश की सत्ता भी यूपीए के नेतृत्व में चलाई। 2004 में वे कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री की स्वाभाविक उम्मीदवार थीं, किंतु उनका विदेशी मूल का मुद्दा पद के आड़े आ गया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। हालांकि एक दशक तक सत्ता-संगठन में उनकी पकड़ किसी से छुपी नहीं है।

इस एक दशक में सोनिया गांधी ने जो चाहा, वह किया। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस उस समय बेहतर स्थिति में थी। सोनिया ने अपना पहला लोकसभा चुनाव कर्नाटक के बेल्लारी और उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से जीता था, किंतु उत्तर प्रदेश की राजनीतिक महत्ता को समझते हुए उन्होंने बेल्लारी सीट छोड़ दी थी। वैसे भी रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, पीलीभीत जैसी सीटें गांधी-नेहरू परिवार के नाम से ही पहचानी जाती रही हैं।

यह लीक पिछली बार तब टूटी, जब राहुल अमेठी से चुनाव हार गए। अब सोनिया गांधी का भी राजस्थान से राज्यसभा जाना रायबरेली के सामने यक्ष प्रश्न छोड़ गया है कि यदि सोनिया नहीं तो फिर कौन? वैसे एक बात तो तय है कि उत्तर प्रदेश, जहां कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा, वहां से सोनिया गांधी का जाना कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने का एक और कारण बनेगा। राहुल गांधी अब संभवतः अमेठी का रुख नहीं करेंगे, क्योंकि राम मंदिर लहर में उनके लिए वहां कुछ नहीं बचा है।

वे लोकसभा में केरल की वायनाड सीट का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे, ऐसी संभावना है। प्रियंका गांधी चुनाव लड़ेंगी या नहीं, यह कांग्रेस का सबसे रहस्यमयी प्रश्न है और सोनिया गांधी रायबरेली से जीत ही जातीं, यह भविष्य के गर्भ में है। ऐसे में सोनिया गांधी का राज्यसभा जाना कहीं न कहीं दोनों सदनों में गांधी-नेहरू परिवार की प्रासंगिकता बचाना अधिक लग रहा है। फिर जिस प्रकार राज्य इकाइयों से पुराने कांग्रेसी ‘हाथ का साथ’ छिटककर ‘कमल दल’ की सवारी कर रहे हैं, ऐसे में कांग्रेस को पुनः रिवाईव करने में गांधी-नेहरू परिवार के नाम का सहारा चाहिए होगा और लोकसभा में राहुल व राज्यसभा में सोनिया का प्रतिनिधित्व इस काम को बखूबी अंजाम देगा।

(हरिमोहन विश्वकर्मा हिंदी राष्ट्रीय दैनिक तरुणमित्र के प्रबंध संपादक हैं)


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