July 24, 2024 |

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जातिगत जनगणनाः जातीय नेताओं से दूर हो रहीं उनकी जातियां

Sachchi Baten

सच्ची बातें….

बिहार में जातिगत जनगणना शुरू हो जाने से नीतीश का कद पूरे देश के ओबीसी में बढ़ा

 

राजेश पटेल

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चुनावी मौसम है। INDIA & NDA आमने-सामने । सभी के अपने-अपने हथियार। बिहार में जातिगत जनगणना में कानूनी अड़चन समाप्त हो गई है। INDIA  में भले ही कई दल हैं, लेकिन इससे पूरे देश में किसी नेता का कद ओबीसी में बढ़ा है तो उसका नाम नीतीश कुमार है। रोहिणी आयोग की रिपोर्ट और जातिगत जनगणना। दोनों की टाइमिंग करीब-करीब एक। यह कहानी बहुत कुछ कहती है। इसमें नफा किसका होगा, नुकसान में कौन रहेगा। यह तो बाद में तय होगा ही, लेकिन इस समय सबसे ज्यादा घाटा यूपी में एनडीए के सहयोगी जातीय क्षत्रपों का दिख रहा है। जातीय नेताओं से उनकी जातियां दूर होती जा रही हैं।

पहले चर्चा जातिगत जनगणना की…

बिहार में जातिगत जनगणना कराने की शुरुआत हुई तो इसके खिलाफ बिहार हाईकोर्ट पटना में याचिका दायर की गई। फौरी तौर पर हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। उस समय इसे न चाहने वालों ने काफी जश्न मनाया था। सोशल मीडिया पर नीतीश कुमार को लेकर न जाने क्या-क्या लिखा गया। यूपी में भी ओबीसी और एससीएसटी की राजनीति करने का दावा करने वाले नेता भी लगातार जातिगत जनगणना की मांग करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में एनडीए के प्रमुख दोनों दल  इसी श्रेणी में आते हैं। अब एक और दल शामिल हो चुका है। लेकिन इनमें से जातिगत जनगणना के मुद्दे पर चुनाव के पहले इस समय कोई कुछ भी नहीं बोल रहा है। जबकि विधानसभा चुनाव 2022 या इसके कुछ माह बाद तक भी इन पार्टियों के नेता हर मंच पर जातिगत जनगणना का खुद को समर्थक बताते थे। इतना ही नहीं, इसके पक्ष में तर्क देते भी नहीं थकते थे।

इसके ठीक उलट, जब बिहार में जातिगत जनगणना वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुरू कराई तो पूरे देश के ओबीसी में खुशी थी। उनको उम्मीद थी कि बिहार की देखा-देखी अन्य राज्यों में भी कराई जाएगी। केंद्र सरकार भी करवा सकती है। लेकिन हुआ ठीक उल्टा। याचिकाओं के कारण बिहार हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी तो ओबीसी में काफी निराशा हुई। वैचारिक रूप से उग्र हो गए थे। अब जब हाईकोर्ट से हरी झंडी मिलते ही जातिगत जनगणना शुरू हुई है तो केवल बिहार का ओबीसी खुश नहीं है। पूरे देश का ओबीसी खुश है। देश भर के ओबीसी में नीतीश का कद बढ़ा है। भाजपा के तीनों सहयोगी दलोंं के नेताओं को उनकी जाति के नेता के तौर पर जाना जाता है। खासकर कुर्मी समाज के बीच नीतीश के समर्थकों की संंख्या तेजी से बढ़ रही है। इस मुद्दे पर इन पार्टियों के नेताओं की हालिया चुप्पी से यूपी के ओबीसी को अचरज हो रही है।

रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपने का समय

पहली अगस्त को पटना हाईकोर्ट ने जातिगत आरक्षण के खिलाफ याचिका को खारिज की। दो अगस्त को रोहणी कमीशन का जिन्न मीडिया के माध्यम से बाहर निकलता  है। ओबीसी के उप वर्गीकरण के लिए रोहिणी कमीशन का गठन 2017 में  किया गया था। इसे 13 बार विस्तार दिया गया। अब जस्टिस रोहिणी ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी है। रिपोर्ट में जो भी हो, सरकार इसे लागू करेगी या नहीं, लागू  करेगी तो तब करेगी। यह सब अभी स्पष्ट नहीं  है। इतना स्पष्ट हो चुका है कि दो अगस्त से जातिगत जनगणना की कम, रोहिणी कमीशन की ज्यादा चर्चा होने लगी है। एनडीए के लिए यह खुशी की बात होनी चाहिए।

क्या रुख है ओबीसी महासभा उत्तर प्रदेश का

जस्टिस रोहिणी आयोग द्वारा रिपोर्ट  राष्ट्रपति को सौंपे जाने पर ओबीसी महासभा उत्तर प्रदेश ने ऐतराज जताया है। महासभाा के राष्ट्र्रीय प्रवक्ता डॉ. अनूप पटेल ने कहा कि जातिगत जनगणना के बिना यह रिपोर्ट मात्र राजनीतिक शिगूफा है। डॉ. पटेल ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग ओबीसी आरक्षण के वर्गीकरण के लिए आयोग की सिफारिश करता है, लेकिन ओबीसी आरक्षण के लाखों बैकलॉग के पद भरने के लिए कोई कमेटी गठित करने की सिफारिश क्यों नहीं करता। डॉ. पटेल ने कहा कि  जातिगत जनगणना से ही ओबीसी की जातियों की संख्या की सही जानकारी होगी। इसलिए पहले यह जरूरी है। इसके  बिना यदि रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू कर दी गई तो उसका कोई फायदा नहीं।

भारतीय किसान यूनियन (लोकशक्ति) का रुख

भारतीय किसान यूनियन (लोकशक्ति) के प्रदेश के मुख्य महासचिव बजरंगी सिंह कुशवाहा ने जातिगत जनगणना को लेकर बिहार हाईकोर्ट के निर्णय की सराहना की। वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति  भी आभार जताया। कुशवाहा ने भी कहा कि रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट को सही तरीके से लागू करने के लिए जातिगत जनगणना जरूरी है।

 

(लेखक सच्ची बातेंं डॉट कॉम के प्रधान संपादक हैं।)

 

 

 

 


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