July 24, 2024 |

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सीएएः चुनावी महायुद्ध में भाजपा का ब्रह्मास्त्र

Sachchi Baten

अयोध्या के बाद मोदी सरकार के तरकश से निकला एक और तीर

-राम मंदिर और सीएए मोदी सरकार के दो अचूक चुनावी हथियार

-400+ के लक्ष्य को पाने में कोई कसर नहीं बाकी रख रही भाजपा

-एनडीए के कुनबे में भी रोज हो रहे नए इज़ाफे

-राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के आगे कितने प्रभावी होंगे पीडीए जैसे मुद्दे

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। केन्द्र की मोदी सरकार ने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के रास्ते में पकाई जा रही दाल में राम मंदिर के शुभारम्भ के बाद अब समान नागरिक संहिता कानून का तड़का भी लगा दिया है। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राह पर चल रही भाजपा को यह पक्की उम्मीद है कि जिस रास्ते पर वह चल रही है, वह उसकी तीसरी जीत के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

हालांकि फिर भी सतर्कता के साथ आगे बढ़ते हुए वह अपने पुराने सहयोगियों को भी निरन्तर अपने साथ जोड़ने का काम कर रही है। राम मंदिर का मुद्दा 2024 के चुनाव में मोदी सरकार के लिए रामबाण का रूप धर चुका है, और बीजेपी को केंद्र में अकेले अपने दम पर बहुमत की सीढ़ियां चढ़ने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक स्तर का महानायक हो जाने का भी बड़ा सहारा मिल रहा है।

फिर भी पार्टी और उसके रणनीतिकार पार्टी के तरकश में से तीर छोड़ने में कसर नहीं छोड़ रहे हैं, जैसे सीएए के नोटिफिकेशन का तीर। पार्टी के रणनीतिकार मान रहे हैं कि लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी की जीत पक्की ही है, अपनी उपलब्धियों को चुनावी सफलता में बदलने के लिए भाजपा ने जिस तरह से अब तक हर प्रयास किया है, उसी तर्ज पर अब आगामी लोकसभा चुनाव में भी फिर से सत्ता में आने से बिखरे विपक्ष द्वारा उसे रोक पाना संभव नहीं लगता।

विपक्ष और भाजपा के बीच 400 पार के नारे से देश में एक मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू हो गया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य चुनावी मुकाबला शुरू होने से पहले ही विपक्ष का उत्साह ठंडा करके उसे ‘वॉकओवर’ के लिए विवश कर देना है। बिखरे हुए विपक्ष के बीच ऐसा करना बेहद आसान है। राम मंदिर ने बीजेपी की फिर से, यानी तीसरी बार सत्ता में आने की लड़ाई का मुकाबला आधा कर दिया है और सीएए लागू करने के फैसले ने बाकी आधी जंग को जीतने में मददगार बना दिया है।

2014 में जनता ने कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार के प्रति नाराजगी जताते हुए सन 2014 में नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल पर भरोसा करके वोट दिया था। तब विपक्ष कहता रहा कि बीजेपी और उनके नेता नरेंद्र मोदी राम के नाम पर वोट लेकर सत्ता में आए, लेकिन अयोध्या की देहरी तक भी नहीं आए। बात सही है। 2014 में अपनी ‘परिवर्तित छवि’ को लेकर मोदी इतने सतर्क थे कि कभी उन्होंने राम मंदिर बनाने का नाम तक नहीं लिया।

तब उन्होंने अयोध्या मुद्दे व अयोध्या नगरी से रणनीतिक दूरी भी बनाए रखी, और देश के मूड को समझते रहे। हालांकि सब कुछ भीतर ही भीतर चलता रहा। लेकिन 2019 में जब वे अपनी जीत में कामयाब होकर दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने, तो उधर का रुख किया और अयोध्या, राम व राम मंदिर के बारे में केवल तीन साल में ही पूरी धारणा को बदलकर नई अवधारणा स्थापित कर दी। अब राम मंदिर अपने साक्षात स्वरूप में हम सबके सामने है और राम नाम की दीवानगी भी अपने साकार स्वरूप में देश में सर्वत्र देखने को मिल रही है।

अब जब भारत के कोने कोने से लोग रामलला के दर्शन करने अयोध्या पहुंच रहे हैं। तभी मोदी सरकार ने चार साल पहले संसद में बने सीएए कानून को लागू करने की अधिसूचना जारी कर हिन्दू मतदाताओं के सामने एक और चारा फेंक दिया है। इधर विपक्षी गठबंधन नए तरीके से भाजपा, प्रधानमंत्री मोदी और संघ परिवार पर हमलों के हथियार तलाश रहा है, तब मोदी सरकार दांव पर दांव चलकर आगे बढ़ रही है। हिंदुस्तान की हिंदी पट्टी में राम लहर दिख रही है और राम मंदिर के मामले में, विपक्ष अब दावे के साथ कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

हां, विपक्ष इस बार मोदी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी की बात जरूर करने लगा है, लेकिन यह बता नहीं पा रहा है कि एंटी-इनकंबैंसी है कहां? जबकि प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर और सीएए के जरिये अपनी तीसरी पारी का मार्ग प्रशस्त करने में सफल हो गए हैं। विपक्ष भले राम मंदिर पर मोदी सरकार के आगे पस्त दिखाई दिया हो लेकिन सीएए पर वह जरूर मुखर है। लेकिन विपक्ष की मुखरता इस मायने में कोई अर्थ नहीं रखती क्योंकि विपक्ष एकजुटता खो चुका है। अगर इंडिया गठबंधन के बैनर तले 28 पार्टियां आज एकजुट होतीं तो सीएए पर तस्वीर अलग होती।


Sachchi Baten

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