July 23, 2024 |

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MIRZAPUR: अनुप्रिया पटेल को चुनौती दे पाएंगे बसपा के मनीष त्रिपाठी?

Sachchi Baten

रिकॉर्ड बताते हैं कि अनुप्रिया पटेल का पलड़ा बहुत भारी

-2019 का चुनाव सपा-बसपा ने मिलकर लड़ा, फिर भी अनुप्रिया जीतीं 2 लाख 32 हजार मतों के अंतर से

-2014 के चुनाव में बसपा प्रत्याशी समुद्र बिंद को मिले थे मात्र 2 लाख 17 हजार 457 मत

-2024 के चुनाव में बाहरी-भीतरी नहीं, मिर्जापुर का विकास बन रहा मुद्दा

राजेश पटेल, मिर्जापुर (सच्ची बातें)। उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों में मिर्जापुर की खासी चर्चा है। एक तो यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का पड़ोसी है। दूसरा यहां से लगातार दो बार से जीत रहीं अनुप्रिया पटेल हैं। वह हैट्रिक लगाकर पुराने सारे मिथकों को तोड़ पाती हैं या नहीं। इस बात को लेकर चट्टी-चौराहों पर ज्यादा चर्चा है। मिर्जापुर में जो मौजूदा स्थिति है, उसके अनुसार अभी तक अनुप्रिया पटेल को चुनौती दे पाने में सक्षम कोई नहीं दिखता। आगे क्या होगा, यह कोई नही जानता। उनकी जीत की संभावनाओं को प्रबल बनाने के लिए पिछले रिकॉर्ड अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

विस्तार से 

अपना दल एस की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने पहली बार मिर्जापुर संसदीय सीट से 2014 में चुनाव लड़ा। मिर्जापुर में नई-नई थीं। सो चुनौती बड़ी थी। भारतीय जनता पार्टी का समर्थन था। सामने बसपा की समुद्र बिंद, सपा के सुरेंद्र सिंह पटेल, कांग्रेस के ललितेशपति त्रिपठी जैसे कद्दावर नेता  थे। अनुप्रिया के व्यक्तित्व को मोदी लहर ने और चमका दिया। परिणाम 2 लाख 19 हजार से ज्यादा मतों से अनुप्रिया पटेल को जीत मिली। इसमें सपा की समुद्र बिंद को 2 लाख 17 हजार 457, कांग्रेस के ललितेशपति त्रिपाठी को 1 लाख 52 हजार 666, समाजवादी पार्टी के सुरेंद्र सिंह पटेल को एक लाख 8 हजार 859 मत मिले थे।

अब आइए 2019 के चुनाव परिणाम पर

पार्टी अपना दल एस। सहयोग भारतीय जनता पार्टी का। एनडीए को हराने के लिए सपा-बसपा का गठबंधन था। गठबंधन के तहत यह सीट समाजवादी पार्टी के हिस्से में आई थी। सपा के उम्मीदवार थे राम चरित्र। बसपा के सहयोग से इनको कुल 3 लाख 59 हजार 556 मत मिले। जबकि अनुप्रिया पटेल को 5 लाख 91 हजार 564 मत मिले थे। कांग्रेस के ललितेशपति त्रिपाठी को 91 हजार 501 वोट मिले।

विश्लेषण

पिछले दो चुनावों के मुकाबले  इस बार भी मोदी लहर कमजोर नहीं दिख रही है। इन दस वर्षों में मिर्जापुर में जो विकास कार्य हुुए हैं, वह भी बोल रहे हैं कि अनुप्रिया पटेल ने मिर्जापुर को अपना बना लिया और मिर्जापुर ने उनको।

मतों के अनुसार विश्लेषण करें तो  2014 में बसपा के मूल मतों में जातीय भावना वाले वोट जुड़ गए थे। समुद्र बिंद का जातीय आधार मिर्जापुर संसदीय सीट में बड़ा है। जाति और पार्टी का कुल मिलाकर 2 लाख 17 हजार 457 मत बिंद को मिले थे। समाजवादी पार्टी के सुरेंद्र सिंह पटेल को 1 लाख 8 हजार 859 मत। दोनोंं को मिला दिया जाए तो 3 लाख 26 हजार 316 मत हुए। 2019 में भी जब सपा-बसपा साथ थीं, तब 3 लाख 59 हजार 556 मत मिले। करीब-करीब यही स्थिति इस बार भी रहने वाली है।

इस बार के चुनाव में सपा के साथ बसपा नहीं, कांग्रेस है। कांग्रेस को पिछले दो चुनावों में जो वोट मिले, वह आज की बदली हुई परिस्थिति में अधिकतम कहे जा सकते हैं। 2014 के चुनाव से 2019 के चुनाव में कांग्रेस के वोट घटे भी। 2014 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार ललिलेतपति त्रिपाठी को 1 लाख 52 हजार 666 मत मिले थे। इस बार कांग्रेस का उम्मीदवार नहीं है। यदि ये वोट सपा के पक्ष में ट्रांसफर हो भी जाते हैं (संभावना नहीं है) तो भी अनुप्रिया पटेल को सपा प्रत्याशी कड़ी टक्कर भी देने की स्थिति में नहीं होगा।

2014 में सपा के सुरेंद्र सिंह पटेल को जो एक लाख आठ हजार 859 मत मिले थे, उसी को इस समय अधिकतम माना जा सकता है। क्योंकि सपा संगठन ने जिले में इस दौरान कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे उसके मतों में वृद्धि हो। 2019 में तो जो मत मिले थे, उनमें बसपा का बड़ा योगदान था। 2014 में सुरेंद्र सिंह पटेल को कुर्मी मत भी बहुतायत में मिले थे। मान लिया जाए कि 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को जो मत मिले थे, वह सपा के ही थे। बसपा के वोट ट्रांसफर नहीं हुए तो भी 2024 में बात बनती नहीं दिखाई दे रही है। 2019 में सपा को 2 लाख 17 हजार 457 मत मिले थे। इसमें कांग्रेस को 2014 में मिले 1 लाख 52 हजार 666 मतों को मिला दिया जाए तो कुल 3 लाख 70 हजार 123 ही होते हैं। जबकि अनुप्रिया पटेल को इस बार भी पांच लाख से ज्यादा वोट मिल सकते हैं। पिछले चुनावों में उनको कम मत मिलें, ऐसा कोई कारण नहीं है।

बसपा तो कहीं से भी चुनौती देती नहीं दिख रही है। इसके प्रत्याशी मनीष त्रिपाठी को ब्राह्मण होने का कुछ फायदा मिलेगा। यह भी सही है कि ललितेशपति त्रिपाठी की तरह इनकी लोकप्रियता ब्राह्मण समाज में नहीं है। केवल बसपा के इतने वोट मिर्जापुर में नहीं हैं, जो चुनाव को प्रभावित कर सकें।

बहरहाल चुनावी ऊंट कभी भी कोई करवट ले सकता है। चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा कि मोदी लहर और सर्वसमाज को सम्मान देने के साथ ही विकासवाद अनुप्रिया पटेल के मतों को कितना बढ़ा पाता है या इसका कोई असर नहीं होता। विपक्ष द्वारा गढ़े जा रहे बाहरी-भीतरी के नारे को जनता कितनी गंभीरता से लेती है, यह भी देखने वाली बात होगी।

 

 

 

 


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