July 24, 2024 |

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इतिहास का ठुकराया हीरा- वीर छत्रपति संभाजी

Sachchi Baten

11 मार्च “बलिदान दिवस”

संभाजी महाराज के बारे में वह पढ़िए, जो इतिहासकार प्रायः नहीं बताते

प्रो. संदीप कुमार


वीर शिवाजी महाराज जी के पुत्र वीर संभाजी का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। आप वीर शिवाजी महाराज जी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे। आपने 11 मार्च 1689 को वीरगति प्राप्त की थी। इस लेख में वीर संभाजी महाराज जी के उस महान और प्रेरणादायक जीवन के हमें दर्शन होते हैं, जिसका वर्णन इतिहासकार प्राय: नहीं करते।

औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की संभाजी महाराज इस समय अपने पाँच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे हैं। बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला, जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था। मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मदांध था। संभाजी महाराज के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बाछें खिल उठीं। वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की ओर। संभाजी महाराज अपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे। वह एक बाड़ी में बैठे थे कि उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे हैं और उनके हाथ से रक्त बह रहा है। कलश ने संभाजी महाराज जी से कुछ भी नहीं बोला। बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए। परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था। शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया। संभाजी महाराज व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया। वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा। दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी।

औरंगजेब को जब यह समाचार मिला, तो वह ख़ुशी से झूम उठा। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया। वहां संभाजी महाराज और कवि कलश को रंग बिरंगे कपड़े और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गयी। फिर उन्हें ऊँट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया। औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्दों से उनका स्वागत किया। संभाजी महाराज जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी, परन्तु वह शांत रहे। उन्हें बंदी गृह भेज दिया गया। औरंगजेब ने संभाजी महाराज जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम कबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा।

नर केसरी लोहे के सीखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था। आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये। फटे हुए चीथड़ों में लिपटा हुआ उनका शरीर मिट्टी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था। उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी महाराज टकटकी बंधे हुए देख रहे थे। पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ। निश्चिंत रहिये। मैं मर जाऊँगा लेकिन…..

लेकिन क्या संभाजी …रुहल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहा। तुम मरने से बच सकते हो संभाजी । परन्तु एक शर्त पर।

संभाजी महाराज जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता। शिवाजी महाराज का पुत्र मरने से कब डरता है। लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी संभाजी – रुहल्ला खान ने कहा।

कोई चिंता नहीं, उस जैसी मौत भी हम हिन्दुओं को नहीं डरा सकती। संभव है कि तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो। संभाजी महाराज जी ने उत्तर दिया।

लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त है बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना है। तेरी जान बख्श दी जाएगी। संभाजी महाराज बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया।

उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से संभाजी महाराज जी की दोनों आँखें फोड़ दी गई। उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया।

आखिर 11 मार्च को वीर संभाजी महाराज के बलिदान का दिन आ गया। सबसे पहले संभाजी महाराज जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरा पैर। संभाजी महाराज कर पाद-विहीन धड़ दिन भर खून की तलैया में तैरता रहा। फिर सायंकाल में उनका सर काट दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया। फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया।

मराठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर अपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दाह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर संभाजी महाराज जी की समाधि है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

(प्रो. संदीप कुमार बिहार के मोतिहारी से हैं। सामाजिक चिंतक हैं।)

 


Sachchi Baten

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