July 16, 2024 |

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पुस्तक : तू जमाना बदल

लेखक : राजेश पटेल

Sachchi Baten

 

तू जमाना बदल

  

                       पुस्तक : तू जमाना बदल

                                                                            लेखक : राजेश पटेल                                    

                                              प्रस्तावना

 “धरती की लड़ाई देवों की पुष्पवर्षा से नहीं जीती जाती। चलना पड़ता है अयोध्या से लंका तक राम को भी, गोकुल से द्वारका तक 
  श्याम को भी।“


आजादी के बाद के सबसे बड़े क्रांतिकारी के रूप में यदि उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला के चुनार विधानसभा के पूर्व विधायक श्री यदुनाथ सिंह पटेल का नाम लिया जाता है तो इसमें कोई गलत नहीं है। उन्होंने अन्याय के खिलाफ हर मोर्चे पर संघर्ष किया। अधिकारियों की मनमानी हो, पुलिस का गुरूर हो या सामंतवाद। यदुनाथ सिंह ने 1972 से लेकर जब तक शरीर साथ दिया, इन ताकतों के खिलाफ हुंकार भरी। मारेंगे नहीं-मानेंगे भी नहीं। यह उनका सूत्रवाक्य था। बीएचयू में स्नातक और केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में आए तो फिर राजनीति के ही होकर रह गए। जनता के हक की लड़ाई में उनको 56 बार जेल जाना पड़ा। शरीर पर पड़े पुलिस की लाठियों की तो कोई गिनती ही नहीं। शरीर का ऐसा कोई अंग नहीं, जो टूटा न हो।

1974 और 1977 के आमचुनाव में मुगलसराय विधानसभा सीट से निर्दल चुनाव भी लड़े। यह अलग बात है कि सफलता नहीं मिली, लेकिन जिस अंदाज में विजयी उम्मीदवार को टक्कर दी, आज भी लोग उसकी मिसाल देते हैं। पहली बार मात्र 428 तथा दूसरी बार जनता पार्टी की लहर के बावजूद करीब 1300 मतों से हारे थे। यही कारण है कि जनता ने उनको हारा हुआ कभी नहीं माना। परिणाम आने के बाद दोनों बार विजेता की ही तरह से स्वागत किया। यह सच है कि रामनगर ने उनको नेता बनाया। बा द में चुनार की जनता ने विधायक चुना। कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होकर राजनीति शुरू करने वाले यदुनाथ सिंह कब समाजवादी हो गए, उनको भी पता नहीं चला।

 

1971 में रामनगर के पीपा पुल के पथकर माफी के आंदोलन के कारण राष्ट्रीय फलक पर उभरे यदुनाथ सिंह ने ऐसी क्रांति की, जिसमें क्रांतिकारियों के पास कोई हथियार नहीं थे। अपना खून बहाया, लेकिन प्रशासन और पुलिस का एक बूंद भी खून कभी बहने नहीं दिया। गरीबी की आंच में तपकर यदुनाथ सिंह के रूप में ऐसा फौलाद तैयार हुआ था, जिसे आग भी नहीं डराती थी। गंगा की लहरें इस शख्स को उलझा पाने में नाकामयाब थीं। लालच कोसों दूूर थी। राजसत्ता लाख चाहने के बाद भी इनके विचारों का दमन नहीं कर सकी। ईमानदारी की ताकत क्या होती है, इसे बनारस के उस समय के तपाकी डीएम भूरेलाल ने खूब समझा। पड़ाव पर जब यदुनाथ सिंह ने उनको उठाकर पटक दिया तो भूरेलाल जी ने पुलिसकर्मियों को यह कहते हुए इनको गिरफ्तार करने से रोका था कि जीवन में पहली बार कोई उनसे इस तरह से भिड़ा है, निश्चित तौर पर यह ईमानदार होगा। इनको लगा कि हाईकोर्ट ने भी उनके साथ न्याय नहीं किया है तो उसके खिलाफ भी जंग छेड़ दी।

भूमिका से यदि आप अंदाज लगा रहे हैं कि यह एक उपन्यास है। कहानी काल्पनिक है तो यकीन मानिए आप बिल्कुल गलत हैं। यह ऐसे इंसान की जीवन यात्रा है, जिसे आज तक कोई समझ ही नहीं सका। करीबी मित्रों व पारिवारिकजन ने भी नहीं। उनके एक नारे “तू जमाना बदल” में उनके सारे विचार निहित हैं।

गरीब का बेटा, फिर बीएचयू जैसे विश्वस्तरीय संस्थान में  इंजीनियरिंग के छात्र से राजनीतिक सफर में बहुतेरे लोग साथ आए और फिर नमक-रोटी की दुनिया में खो गए। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी जुड़े, जिनको लोग आज तक जानते हैं। लोग कहते हैं कि सर्वश्री हरबंश सिंह, बजरंगी कुशवाहा, विश्वकांत ओझा, रामचंद्र सिंह, शमीम अहमद मिल्की, शकुंतलाल यादव, मोहनलाल सोनकर, शोभनाथ पटेल, सरदार सतनाम सिंह, दयाराम सिंह उर्फ अटल जी, शमीम अहमद देवलासी, बाबूलाल रावत, सुशील बाबा, बैरिस्टर मोहम्मद वसी, शिवधनी सिंह, विंध्यवासिनी प्रसाद मिश्र उर्फ नफ्फल गुरु, राम आसरे सिंह, मेवा सरदार, दौलत राम सिंह, शंकर मांझी, अब्दुल सत्तार, रामदेव बिंद, रामजी सिंह जैसे अनगिनत लोगों ने उनका हर कदम पर साथ दिया। इन लोगों ने अपनी पूरी जवानी यदुनाथ सिंह के साथ मिलकर संघर्षों में ही बिता दी।

आगे आप इन लोगों को बारे में भी विस्तार से पढ़ेंगे कि उनके दिए नारे को सफल बनाने के लिए कितना त्याग किया। कितनी यातनाएं सहीं। इस कड़ी में मंगरू धोबी को भुलाया नहीं जा सकता। वर्ष 1980 से लेकर 1993 तक लखनऊ के विधायक निवास दारुलसफा के यदि किसी कमरे में सच्चा समाजवाद और सामाजिक न्याय की अवधारणा हकीकत के पैमाने पर खरी उतरती थी तो वह था ए ब्लॉक का 100 और 166 नंबर कक्ष। मंगरू धोबी खाना बनाते थे, बाबूलाल डोम परोसते थे और तिवारी जी, मिश्रा जी, लाला जी, बाबू साहेब आदि सभी साथ खाते थे। यदुनाथ सिंह को जनता के हक की लड़ाई के लिए 56 बार जेल जाना पड़ा था। इसमें सबसे लंबे समय तक इमरजेंसी काल में बंद रहे। जारी…


Sachchi Baten

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