July 24, 2024 |

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आजाद भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी यदुनाथ सिंह पर आधारित पुस्तक ‘तू जमाना बदल’

Sachchi Baten

 

आजाद भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी यदुनाथ सिंह पर आधारित पुस्तक ‘तू जमाना बदल’

 

पुस्तक के लेखक राजेश पटेल की कलम से

 

लीक-लीक गाड़ी चलै, लीकहि चलें कपूत।

यह तीनों उल्टे चलैं, शायर, सिंह, सपूत।

 

महान विचारक और आजादी के बाद के सबसे बड़े क्रांतिकारी के रूप में यदि उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला के चुनार विधानसभा के पूर्व विधायक श्रद्धेय यदुनाथ सिंह पटेल का नाम लिया जाता है तो इसमें कोई गलत नहीं है। उन्होंने अन्याय के खिलाफ हर मोर्चे पर संघर्ष किया। अधिकारियों की मनमानी हो, पुलिस का गुरूर हो या सामंतवाद। यदुनाथ सिंह ने वर्ष 1966-67 में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से लेकर जब तक शरीर ने साथ दिया, इन ताकतों के खिलाफ हुंकार भरी। मारेंगे नहीं-मानेंगे भी नहीं। हमला चाहे जैसा हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा, यह उनका नारा था।

 

 

वे दिल्ली के लाल किला से ऊंचा चुनार के किला को मानते थे। चुनार की महिमा का बखान जहां मौका मिलता था, करते थे। आखिर ऐसा क्यों न हो। चुनार की धरती ने पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ जैसे विद्रोही कवि को जन्म दिया। प्रसिद्ध उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री ने इसी धरती के बारे में सात खंड में ‘चंद्रकांता’ नामक उपन्यास लिखा है।

 

दूरदर्शन पर प्रसारित ‘चंद्रकांता’ सीरियल काफी लोकप्रिय हुआ था। इसी धरती में यदुनाथ सिंह भी पैदा हुए। धारा के विपरीत चलने की आदत शुरू से ही थी। लकीर पर कभी नहीं चले, हमेशा नई लकीर बनाई। सत्ता से समझौता- ना बाबा ना…। कभी नहीं। चाहे अपनी पार्टी की सरकार रही हो या विरोधी की, जनसरोकारों के मुद्दों को लेकर हमेशा मुखर रहे। पुलिस की सबसे ज्यादा मार तो विधायक बनने के बाद ही पड़ी।

 

 

बीएचयू में स्नातक और केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में आए तो फिर राजनीति के ही होकर रह गए। जनता के हक की लड़ाई में उनको करीब 60 बार जेल जाना पड़ा। शरीर पर पड़े पुलिस की लाठियों की तो कोई गिनती ही नहीं। शरीर का ऐसा कोई अंग नहीं था, जो क्षतिग्रस्त न हो। वर्ष 1974 और 1977 के आमचुनाव में मुगलसराय विधानसभा सीट से निर्दल चुनाव भी लड़े।

 

यह अलग बात है कि सफलता नहीं मिली, लेकिन जिस अंदाज में विजयी उम्मीदवार को टक्कर दी, आज भी लोग उसकी मिसाल देते हैं। पहली बार मात्र 428 तथा दूसरी बार जनता पार्टी की लहर के बावजूद 1280 मतों से हारे थे। यही कारण है कि जनता ने उनको हारा हुआ कभी नहीं माना।

 

परिणाम आने के बाद दोनों बार विजेता की ही तरह से स्वागत किया गया। यह सच है कि मुगलसराय ने उनको नेता बनाया। बाद में चुनार की जनता ने विधायक चुना। कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होकर राजनीति शुरू करने वाले यदुनाथ सिंह कब समाजवादी हो गए, उनको भी पता नहीं चला।

 

दिसंबर 1970-71 में रामनगर के पीपा पुल के पथकर माफी के आंदोलन के कारण राष्ट्रीय फलक पर उभरे यदुनाथ सिंह ने ऐसी क्रांति की, जिसमें क्रांतिकारियों के पास कोई हथियार नहीं था। अपना खून बहाया, लेकिन प्रशासन और पुलिस का एक बूंद भी खून कभी बहने नहीं दिया। गरीबी की आंच में तपकर यदुनाथ सिंह के रूप में ऐसा फौलाद तैयार हुआ था, जिसे आग भी नहीं डराती थी।

 

गंगा की लहरें इस शख्स को उलझा पाने में नाकामयाब थीं। लालच कोसों दूर थी। राजसत्ता लाख चाहने के बाद भी इनके विचारों का दमन नहीं कर सकी। ईमानदारी की ताकत क्या होती है, इसे बनारस के उस समय के तपाकी डीएम भूरेलाल ने खूब समझा।

 

पड़ाव पर जब यदुनाथ सिंह ने एक व्यापारी को पीटते समय जब उनकी बेंत पकड़ ली तो भूरेलाल जी ने पुलिसकर्मियों को यह कहते हुए इनको गिरफ्तार करने से रोका था कि जीवन में पहली बार कोई उनसे इस तरह से भिड़ा है, निश्चित तौर पर यह ईमानदार होगा। इनको लगा कि हाईकोर्ट ने भी उनके साथ न्याय नहीं किया है तो उसके खिलाफ भी जंग छेड़ दी।

 

यह केवल एक पुस्तक नहीं है। अन्याय के खिलाफ संघर्ष का यह मुकम्मल दस्तावेज है। राजशाही के विरोध की प्रेरणा है। गरीबी, अशिक्षा, कुरीति, असमानता और सत्ता प्रायोजित दमन के सामने सीना तानकर खड़ा होने का संदेश है। यह ऐसे इंसान की जीवनयात्रा है, जिसे आज तक कोई समझ ही नहीं सका। करीबी मित्रों व पारिवारिकजन ने भी नहीं। एक नारा ‘तू जमाना बदल’ में उनके सारे विचार निहित हैं।

 

गरीब का बेटा, फिर बीएचयू जैसे विश्वस्तरीय संस्थान में इंजीनियरिंग के छात्र से राजनीतिक सफर में बहुतेरे लोग साथ आए और फिर नमक-रोटी की दुनिया में खो गए। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी जुड़े, जिनको लोग आज तक जानते हैं। सर्वश्री हरबंश सिंह, बजरंगी कुशवाहा, नंदलाल यादव, विश्वकांत ओझा, रामचंद्र सिंह, शमीम अहमद मिल्की, शकुंतलाल यादव, मोहनलाल सोनकर, शोभनाथ पटेल, सरदार सतनाम सिंह, अमरेश सिंह, दयाराम सिंह उर्फ अटल जी, शमीम अहमद देवलासी, छन्नू लाल सिंह, पन्नालाल सिंह, सतीश मेहरोत्रा, रवींद्रनाथ यादव, लक्ष्मीनारायण सिंह, बाबू लाल रावत, रमाकांत पाठक, श्यामाकांत पाठक, डॉ. शमीम सफदर, अनवर बेग, जयराम साहनी, रामनरेश साहनी, डॉ. शिवबालक सिंह, जिलाजीत सिंह, बाबूलाल रावत, सुशील बाबा, बैरिस्टर मोहम्मद वसी सिद्दीकी, राजेंद्र सिंह, शिवधनी सिंह, विंध्यवासिनी प्रसाद मिश्र उर्फ नफ्फल गुरु, राम आसरे सिंह, डॉ. लालबर्ती बिंद, मेवा सरदार, महंत सिंह, दौलत सिंह, शंकर मांझी, अब्दुल सत्तार, रामदेव बिंद, रामजी सिंह, रामदुलार सिंह, मेवालाल गुप्ता सहित अनगिनत लोगों ने उनका हर कदम पर साथ दिया।

 

इन लोगों ने अपनी पूरी जवानी यदुनाथ सिंह के साथ मिलकर संघर्षों में ही बिता दी। बाद में रामभरोसे सिंह, चौधरी यशवंत सिंह, पारस नाथ सिंह, डॉ. यशवंत सिंह (पुरुषोत्तमपुर), नवल किशोर सिंह सहित तमाम लोग इनसे जुड़े। श्री राजबली सिंह जी, श्री आत्माराम यादव जी आदि का भी भरपूर सहयोग मिलता था।

 

इस कड़ी में मंगरू धोबी को भुलाया नहीं जा सकता। वर्ष 1980 से लेकर 1993 तक लखनऊ के विधायक निवास दारुलसफा के यदि किसी कमरे में सच्चा समाजवाद और सामाजिक न्याय की अवधारणा हकीकत के धरातल पर खरी उतरती थी तो वह था ए ब्लॉक का 100 और 166 नंबर कक्ष। मंगरू धोबी खाना बनाते थे, बाबूलाल रावत (डोम) परोसते थे और तिवारी जी, मिश्रा जी, लाला जी, बाबू साहेब आदि सभी साथ खाते थे।

 

यदुनाथ सिंह जी करीब 19 माह तक इमरजेंसी काल में जेल में बंद रहे। हजारों लोग इनके बोलने के अंदाज की नकल आज भी करते हैं। कुछ तो उनकी ही तरह से बोलते भी हैं। इस क्रम में खदेरू मल्लाह का जिक्र न हो तो उनके साथ अन्याय होगा। खदेरू सारथी की भूमिका में थे। श्री यदुनाथ सिंह की गाड़ी को वही चलाते थे।

 

अपनी जवानी में समय को रोक देने वाले यदुनाथ सिंह ने 31 मई 2020 की शाम अंतिम सांस ली। नमन इस महापुरुष को। नमन उनके विचार को। मैं धन्यवाद देता हूं प्रो. हरिकेश सिंह जी, श्री रामदत्त त्रिपाठी जी एवं श्री प्रभात रंजन दीन जी का, जिनका आशीर्वाद मुझे मिला। श्रद्धेय यदुनाथ सिंह जी के सुपुत्र श्री धनंजय सिंह पटेल का भी आभार, जिन्होंने मुझे फोटो, डायरी, पत्र आदि उपलब्ध कराई। श्री दौलत सिंह जी का भी आभार। इनके पास भी कई पत्र थे। सब मुझे मुहैया कराया। जिन लोगों ने अन्य तरीके से भी इस पुस्तक के प्रकाशन में सहयोग किया, उनका भी हृदय से आभार।

जारी…

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