July 24, 2024 |

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मप्र में भाजपा का वोटशास्त्र, हैवीवेट नेताओं के आगे बौने रह गए टिकटार्थी

Sachchi Baten

सच्ची बातेंः मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 Madhya Pradesh Assembly Election 2023

अमित शाह की चाणक्यगिरी से कार्यकर्त्ताओं में निराशा का माहौल

-मप्र भाजपा के हिंदुत्व की प्रयोगशाला, पर अबकी कुछ अलग अंदाज

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। मप्र में आसन्न विधानसभा चुनाव में सबसे पहले टिकट घोषित करने की दौड़ में भाजपा ने बाजी भले मार ली हो, लेकिन पार्टी द्वारा टिकट वितरण में हुए प्रयोगो से पार्टी के अंदर का तापमान उबाल पर है।

राजनीतिक शह-मात, गुटबाजी, कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़ने के बीच भाजपा के कार्यकर्ता विधानसभा चुनाव को लेकर असमंजस में थे किन्तु जैसे ही दूसरी सूची निकली, वे मानो सोती नींद से जाग गए। राजनीतिक पंडितों ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 7 हेवीवेट सांसदों, जिसमें तीन केंद्रीय मंत्री हैं, सहित राष्ट्रीय महासचिव को विधानसभा चुनाव का टिकट देकर प्रदेश का राजनीतिक तापमान बढ़ा देगा।

दरअसल, भाजपाई चाणक्य और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की बागडोर अपने हाथों में ली है, वहां बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहे हैं। पहले जो 49 प्रत्याशियों की सूची जारी हुई थी, उसमें अधिकांश वे विधानसभा सीटें थीं, जहां भाजपा लंबे समय से हार रही थी।

दूसरी सूची में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, ग्रामीण विकास राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते, जल शक्ति राज्य मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल, सांसद राकेश सिंह, सांसद गणेश सिंह, सांसद रीति पाठक, सांसद उदय प्रताप सिंह और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अब विधानसभा चुनाव लड़ते नजर आएंगे।

भाजपा नेतृत्व को आशा है कि कद्दावर नेताओं को टिकट देने से न केवल वो अपनी सीट जीतेंगे बल्कि उनके आसपास की सीटों पर भी इसका असर होगा और भाजपा की कमजोर दशा में सुधार होगा। हालांकि इस सूची के जारी होते ही कहीं-कहीं विवाद की स्थिति बन रही है। कई नेता पुत्र-पुत्रियों का राजनीति में स्थापित होने का सपना टूटा है।

इस दूसरी सूची ने भाजपा के भविष्य की राजनीति की झलक भी दे दी है कि आगामी लोकसभा चुनाव में युवा प्रोफेशनल्स चुनाव लड़ते नजर आएंगे। हालांकि कांग्रेस ने भाजपा की दूसरी सूची पर तंज कसते हुए इसे 15 वर्षों का कुशासन बताया है, किन्तु अब कांग्रेस पर भी दबाव है कि वे अपने राष्ट्रीय स्तर के चर्चित चेहरों जैसे दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, सुरेश पचौरी, विवेक तन्खा, अजीज कुरैशी, कांतिलाल भूरिया को विधानसभा के रण में उतारे और भाजपा को कड़ी चुनौती पेश करे।

फिलहाल भाजपा ने राज्य से जुड़े अपने केन्द्रीय नेताओं को विधानसभा चुनाव में उतारकर हाथ से फिसलते मध्य प्रदेश को कसकर पकड़े रखने का प्रयास किया है। वह इस प्रयास में सफल होती है या नहीं ये चुनाव परिणाम ही बतायेगा। पर हिमाचल, कर्नाटक आदि दुर्ग ढहने के बाद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जनता के बीच यह संदेश नहीं देना चाहता कि प्रदेशों से भाजपा के पैरों तले जमीन खिसक रही है।

फिर मध्य प्रदेश गुजरात की ही भांति हिंदुत्व की प्रयोगशाला का बड़ा गढ़ है और 2018 में कमलनाथ सरकार ने डेढ़ साल के अपने संक्षिप्त कार्यकाल में ही इस प्रयोगशाला को नुकसान पहुंचा दिया था। भाजपा उस नुकसान की भरपाई की कोशिश में है।

 


Sachchi Baten

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