July 24, 2024 |

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महिला आरक्षण बिल के बहाने ओबीसी सांंसद-विधायक देने वाली संसदीय व विधानसभा सीटों पर भाजपा-आरएसएस की नजर

Sachchi Baten

महिला आरक्षण बिल के पीछे छिपे राजनीतिक षडयंत्र और चुनावी राजनीति के गूढ़ निहितार्थ

-ओबीसी के साथ एक बड़ी दूरगामी सामाजिक-राजनीतिक साजिश

 

नन्द लाल वर्मा

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डॉ.  भीमराव आंबेडकर के संविधान की दुहाई देकर एक पिछड़े परिवार से पीएम बनने के अवसर को बड़े फक्र के साथ दावा ठोकने वाले नरेन्द्र मोदी की सरकार में पारित महिला आरक्षण बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए लोकसभा में एक सीट भी आरक्षित नहीं की गई हैं। जबकि डॉ. आंबेडकर किसी समाज की प्रगति या विकास का मानदंड उस समाज की महिलाओं के विकास के साथ जोड़कर देखते थे।

महिला आरक्षण बिल एक खास वर्ग की महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया राजनीतिक कदम आरएसएस और बीजेपी सरकार की सवर्ण मानसिकता/वर्ण व्यवस्था/मनुवादी सोच का परिचायक है। एससी-एसटी की महिलाओं को उनके वर्ग के लिए पूर्व प्रदत्त संवैधानिक राजनैतिक आरक्षण का 33% आरक्षण का रास्ता तो साफ है, लेकिन ओबीसी महिलाओं को लोकसभा में आरक्षण के माध्यम से प्रवेश करने का रास्ता नहीं बनाया गया है।

ओबीसी को यह अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि महिलाओं के नाम जो 33% राजनैतिक आरक्षण दिया गया है, वो वास्तव में केवल सवर्ण महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है,  जैसा कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के सम्बंध में हुआ था।

लोकसभा में महिलाओं के लिए 543 की 33% कुल 181 सीटें आरक्षित होंगी, जिनमें एससी और एसटी की कुल आरक्षित 131सीटों का 33% यानी 47 सीटें (अनुमानित) इस वर्ग की महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण मिल जायेगा। अब 181- 47=134 बची सीटों पर सामान्य वर्ग की सशक्त और संसाधन युक्त परिवार की महिलाओं के लिये चुनाव लड़कर लोकसभा जाने का रास्ता साफ कर दिया गया है क्योंकि सशक्त परिवार की इन महिलाओं का मुकाबला करने वाली आरक्षित वर्ग ( एससी-एसटी और ओबीसी, ओबीसी के विशेष संदर्भ में)  की महिलाएं बहुत कम मिल पाएगी।

इसलिए इन सीटों पर सामान्य वर्ग की सशक्त परिवार की महिलाओं के चुनाव जीतने की सबसे ज्यादा संभावना है। मेरे विचार से सामान्य वर्ग की सशक्त महिलाओं के लिए वे सीटें आरक्षित की जाएंगी, जहां से ओबीसी के पुरुष लंबे अरसे से चुनाव जीतकर आ रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो ओबीसी के लोकसभा में जाने की सम्भावना और संख्या न्यूनतम हो जाएगी, जिससे संसद में उनका प्रभावशाली और निर्णायक प्रतिनिधित्व नहीं रह जाएगा और आरएसएस नियंत्रित बीजेपी का यही हिडेन राजनीतिक एजेंडा है।

संविधान और आरक्षण पर सवाल या तो एससी-एसटी के वे सांसद उठाते हैं या फिर ओबीसी के वे सांसद जो विपक्ष में होते हैं। चूंकि एससी-एसटी के सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था है, इसलिए उनके आनुपातिक आरक्षण या प्रतिनिधित्व पर कैंची चल नहीं सकती है।

जातिगत जनगणना के आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण ओबीसी का आरक्षण या प्रतिनिधित्व अधर में लटका हुआ है। इसलिए ओबीसी की ओर से जातिगत जनगणना और प्रतिनिधित्व विस्तार का मुद्दा लगातार उठाये जाने की संभावना बनी रहती है, जिससे आरएसएस और बीजेपी हमेशा दूर भागना चाहती है।

ओबीसी की जातिगत जनगणना और उसके आरक्षण विस्तार की भावी मांग से आरएसएस और बीजेपी बुरी तरह डरी हुई नज़र आती है। इसलिए बीजेपी ओबीसी के प्रतिनिधित्व को यथासंभव कम करने की कोई कोशिश या प्रयास छोड़ना नहीं चाहती है।

महिला आरक्षण बिल इसी दिशा में सोच समझकर उठाया गया एक कदम है। आरएसएस और बीजेपी के इस महिला आरक्षण बिल के पीछे छिपे जिस राजनीतिक षडयंत्र और चुनावी राजनीति के गूढ़ निहितार्थ को गम्भीरतापूर्वक समझने की जरूरत है, उस पर अभी ओबीसी का फोकस ही नही है।

आरएसएस और बीजेपी ने ओबीसी को मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम, छद्म राष्ट्रवाद और चंद चुनावी लालच में अच्छी तरह फंसाकर रखा है। ज्यादातर क्षेत्रीय दल सामाजिक न्याय का नारा देकर उभरे हैं। इसलिए उनका आधार वोट बैंक सामाजिक,  शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से शोषित, वंचित और पिछड़ा समाज ही है।

इस समाज के लोग राजनीति के लिए उतने सक्षम, सशक्त और तिकड़मी नहीं हैं, जितना कि सवर्ण लोग सक्षम, संसाधनयुक्त और तिकड़मबाज हैं। चुनाव में संसाधनों और राजनीतिक परिपक्वता के संदर्भ में सवर्ण समाज के लोगों के सामने ओबीसी प्रत्याशी कॉन्फिडेंस के स्तर पर कमजोर साबित होते हैं और महिला आरक्षण हो जाने के बाद उनके समाज की महिला प्रत्याशी के सामने ओबीसी महिला प्रत्याशी कितनी मजबूती और कॉन्फिडेंस के साथ लड़ पाएगी, उसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है, क्योंकि ओबीसी की महिलाएं अभी व्यक्तिगत तौर पर सवर्ण महिलाओं की तुलना में उतनी राजनीतिक रूप से स्वतंत्र,सक्षम और कॉन्फिडेंट नही दिखती हैं।

ओबीसी की अधिकांश पढ़ी-लिखी महिलाएं या तो छोटी-छोटी नौकरी कर रही हैं या घर-परिवार की देखभाल कर रही हैं। सामाजिक परिवेश की वजह से राजनीतिक रूप से ओबीसी महिलाएं सवर्ण महिलाओं की तुलना में अभी भी बहुत पीछे हैं। बातचीत करने के मामले में सवर्ण महिलाएं ओबीसी महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा प्रभावशाली और वाकपटु होती हैं,  ऐसा उनके सामाजिक परिवेश में खुलेपन की वजह से होता है।

ओबीसी महिलाओं में राजनीति के वांछित गुणों और तत्वों के अभाव की वजह से ओबीसी की महिला प्रत्याशी सवर्ण महिला प्रत्याशी के सामने मतदाताओं को प्रभावित करने के मामले में पूरी दमदारी के साथ लड़ नहीं पाती है। बीजेपी सरकार द्वारा पारित महिला आरक्षण से ओबीसी का अधिकतम राजनीतिक नुकसान होने के बावजूद पिछड़े वर्गों के उत्थान और भागीदारी की राजनीति करने का दावा करने वाले दलों (अपना दल-एस, सुभासपा, निषाद समाज पार्टी ) का बीजेपी के साथ सरकार में भागीदार बनकर इस बिल के समर्थन में पूरी दमदारी के साथ खड़ा होना उनके सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे और राजनीतिक वैचारिकी पर बड़ा सवालिया निशान लगाता हुआ दिखाई देता है।

पिछड़ों के उत्थान और प्रतिनिधित्व की झूठी राजनीतिक वकालत कर सत्ता की मलाई चाटने का यह राजनीतिक चरित्र और उपक्रम लंबे समय तक नहीं चल पाएगा। दलित समाज के बल पर सत्ता के शिखर तक पहुंची बीएसपी की सामाजिक और राजनीतिक दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। ऐसे दलों को इससे सबक लेने की जरूरत है।

(लेखक वाईजी पीजी कॉलेज लखीमपुर खीरी के अवकाश प्राप्त सहायक प्रोफेसर हैं।)

 


Sachchi Baten

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