July 24, 2024 |

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कैसा रहेगा मानसून, बता रहे पक्षियों के घोंसले, आप भी समझें इनकी बॉडी लैंग्वेज को

Sachchi Baten

इस साल पेड़ों  की चोटी पर घोंसला बना रहे पक्षी

चैत वैशाख में बदले मौसम के हाल से कौवे हो गए थे भ्रम में

 

राजेश पटेल, मिर्जापुर (सच्ची बातें)। प्रकृति के चितेरे पक्षियों को आभास हो गया है कि मानसून कब आएगा और वह कैसा रहेगा। इसी हिसाब से वे अपने घरौंदे (घोंसला) का निर्माण कर रहे हैं। आश्चर्य की बात है कि इस साल चैत व वैशाख में हुई बारिश ने कौवों को तो भ्रम में ही डाल दिया था। उनको भ्रम हो गया कि मानसून आ गया। यह भ्रम कब हुआ और क्यों हुआ। और, क्या प्रमाण है। बड़े सवाल हैं। जवाब मिलेगा, बस आप पूरी खबर पढ़ें।

पक्षियों का प्रजनन काल मानसून का सीजन ही होता है। जब मानसून की आहट मिलती है, घोंसले का निर्माण शुरू कर देते हैं। इस प्रक्रिया में सुरक्षा के हर पहलू की जांच होती है। जरूरत पड़ने पर सुरक्षा बढ़ा भी दी जाती है। पानी की दिक्कत न हो, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है। हालांकि कई प्रजातियों के पक्षी घोंसला नहीं बनाते। वे मेंड़, टीले, चट्टानों, बिलों आदि में भी अंडा देते हैं। ये प्रजातियां भी अंडों व बच्चों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखती हैं।

पहले घोंसलों का मनोविज्ञान

पक्षी जब भी घोंसला बनाते हैं, समझ लीजिए कि मानसून करीब है। यदि बया पक्षी का घोंसला बन कर तैयार हो गया तो मानसून आने में मात्र एक सप्ताह बचे हैं। इसको मौसम की भविष्यवाणी भी समझा जा सकता है।

 

सुरक्षा

घोंसलों के निर्माण में सुरक्षा, भोजन व पानी की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन घोंसलों का सबसे ज्यादा नुकसान आंधी व बारिश से होता है। चूंकि पक्षियों को पता होता है कि किस तरह का मौसम रहने वाला है।सो, उसी हिसाब से स्थान व पेड़ों का चयन करते हैं। घरों के आसपास रहने वाली गौरैया, चरखी, सिरोई आदि किसी भी पेड़ पर या घरों में घोंसला बना लेती है। यदि पेड़ पर घोंसला के लिए वह सबसे ऊंची टहनी फुनगी को चुनती है तो बारिश कम होने की संभावना होती है। यदि बीच का चयन करती है तो औसत तथा यदि मोटे स्थान का चयन करती है तो बारिश ज्यादा होगी। अतिवृष्टि। पक्षियों द्वारा बनाए जा रहे घोंसलों को आधार मानें तो इस साल मानसून की स्थिति ठीक नहीं रहने वाली है।

  बबूल के पेड़ में बया के घोंसले (फोटो साभार दैनिक भास्कर)

बया को बुनकर चिड़िया (weaver birds) भी कहते हैं। इसके घोंसले दो फीट तक लंबे हो सकते हैं। इसमें सुरक्षा का कुछ ज्यादा ही पालन किया जाता है। यह घोंसला तीन मंजिला होता है। अंडे देने के लिए सबसे ऊपरी तल्ला होता है। उसके बीच वाले भाग की दीवारों व फर्श में मिट्टी का लेपन होता है। गीली मिट्टी में जुगनुओं को सटा दिया जाता है, ताकि घोंसले में रौशनी रहे। लेपन दो मकसद के किया जाता है। एक तो यह कि तेज आंधी में घोंसला पलटेगा नहीं, क्योंकि अंदर मिट्टी का वजन है। दूसरे मादा किसी घोंसले के निर्माण में विशिष्टता के आधार पर ही एक सीजन के लिए जीवनसाथी चुनती है।

इसके घोंसले नदियों, नालों के किनारे बबूल या ताड़ के पेड़ पर होते हैं। ताकि सांप, बंदर आदि की पहुंच घोंसले तक न हो। जब ये घोंसला बनाना शुरू करते हैं तो समझ लीजिए मानसून आने वाला है। यदि घोंसला बनकर तैयार हो गया तो एक सप्ताह में मानसून का आना तय है। जब ऊपर की ओर लगाएं तो हल्की बारिश, बीच में लगाएं तो मध्यम और तने के नजदीक लगाएं तो समझिए अतिवृष्टि होगी।

सुरक्षा के लिए ही बया समूह में रहती है। एक पेड़ पर या आसपास के पेड़ों पर थोक में घोंसले दिखते हैं। ये अपनी बस्ती बसाकर रहते हैं। ताकि किसी आक्रमण से सामूहिक रूप से निपटा जाए। किसी आक्रमण की सूचना देने के लिए ये विशेष प्रकार की ध्वनि निकालते हैं।

पहले घर, फिर वर

कुछ ही साल किसी की बेटी की शादी तय करते समय घर-वर प्राथमिकता में होता था। मतलब पहले घर, बाद में वर। अब उल्टा हो गया है। अब वर को ही देखा जाता है। वह लायक है तो उसके घर व जमीन आदि का कोई मतलब नहीं। लेकिन बया मादा पक्षी अभी भी पहले घर देखती है, फिर वर का चयन करती है। प्रजनन काल  आने पर नर बया घोंसला निर्माण में जुट जाता  है। वह चाहता है कि सुंदर से सुंदर और सुरक्षित बनाए, ताकि मादा आकृष्ट होकर आ जाए। घोंसला निर्माण में वह अपनी पूरी इंजीनियरिंग व ताकत लगा  देता है। मादा बया घूम-घूम कर घोंसलों का निरीक्षण करती। वह सुंदरता और सुरक्षा के मानकों पर खरा उतरने वाले एक घोंसले में बैठ जाती है। उस घोंसले को बनाने वाले नर बया से उसका एक सीजन का संबंध बन जाता है।

 

चैत वैशाख की बारिश से कौवों को मानसून का भ्रम हो गया

पिछले 8 मई को कई स्थानों पर कौवों को अपना घोंसला बनाने के लिए पतली लकड़ियों को चुनते बीनते देखा गया। उनका पीछा करने पर पता चला कि घोंसला बना रहे हैं। फोटो लेने का काफी प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। लेकिन अब कोई कौवा घोंसला बनाते नहीं दीख रहा है। इसका मतलब साफ है कि चैत व वैशाख में हुई बारिश से मौसम ठंडा हो गया था। यह उनके अनुमान से विपरीत था, सो भ्रमित हो गए होंगे कि मानसून करीब है। इसी लिए घोंसले का निर्माण शुरू किया, अब बंद कर दिया है। क्योंकि उनको पता चल गया कि यह भ्रम था। असली मानसून के आने का संकेत मिलेगा।

 

 

 

 


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