July 24, 2024 |

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अपना दलः जाति से जमात की ओर तेजी से बढ़ते कदम

Sachchi Baten

स्थापना दिवस पर विशेषः डॉ. सोनेलाल पटेल द्वारा लगाए गए पौधे को वटवृक्ष बना रहीं अनुप्रिया पटेल

-सधे कदमों से आगे बढ़ा रही हैं सामाजिक न्याय की वैचारिक लड़ाई को

राजेश पटेल, लखनऊ (सच्ची बातें)। किसी जातीय संगठन को जमात में लोकप्रिय बनाना आसान नहीं है। लेकिन केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने इस कठिन कार्य को करने का बीड़ा उठा लिया है। और, सधे कदमों से सफलता की ओर बढ़ भी रही हैं। बात हो रही है अपना दल की। इस दल का स्थापना दिवस चार नवंबर को है।

1995 में इस दल की स्थापना के पहले डॉ. सोनेलाल पटेल कुर्मी चेतना रथ लेकर निकले थे। उत्तर प्रदेश और इसकी सीमाओं से बाहर घूमने के बाद चार नवंबर को कुर्मी क्षत्रिय महारैली का आयोजन लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में किया था। इस महारैली में देश भर से कुर्मी समाज से लाखों लोग जुटे थे। इस महारैली में जनसमुद्र उमड़ पड़ा था। बीबीसी लंदन ने इसे सबसे बड़ी जातीय रैली करार दिया था। इसी महारैली में आम सहमति बनी थी कि एक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की जाए, जिसका नाम अपना दल होगा।

शुरुआत में तो अपना दल के साथ सिर्फ कुर्मी थे। लेकिन डॉ. सोनेलाल पटेल ने अथक परिश्रम करके इसे कमेरा समाज, यूं कहें कि दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को भी इससे जोड़ना शुरू किया। दूसरे लोग अपना दल को सिर्फ कुर्मियों की पार्टी कहा करते थे। इसके जवाब में अपना दल का विश्लेषण डॉ. पटेल ने बेहतरीन ढंग से किया था। अ से अगड़ा, प से पिछड़ा, ना से नापतौल यानि बनिया, द से दलित तथा ल से लाला। अल्पसंख्यक तो अगड़े भी हैं और पिछड़े भी।

जातीय दल इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि चार नवंबर को जो भीड़ बेगम हजरत महल पार्क में आई थी, वह कुर्मी क्षत्रिय महारैली के नाम ही आई थी। उसमें तकरीबन सभी पार्टियों के कुर्मी नेता पहुंचे थे। लेकिन जब अपना दल नामक राजनैतिक पार्टी बनाने का एलान मंच से हुआ तो दूसरी पार्टियों में आस्था रखने वाले नेता खिसक लिए, लेकिन आम कुर्मी अंत तक डटा रहा।

डॉ. सोनेलाल पटेल ने अपना दल को उठाने में पूरी ताकत लगा दी। उनके साथ अनेक लोगों का कारवां जुड़ता गया और दल को जनाधार मिलता गया। डॉ. पटेल ने कई विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव पार्टी की ओर से लड़ा, पर उन्हें जीत नहीं मिल सकी। फूलपुर लोकसभा उनकी पसंदीदा सीट थी, जिस पर 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। हालांकि 2000 में प्रतापगढ़ सदर सीट के लिए हुए उपचुनाव में उनकी पार्टी ने खाता खोला था। पहले विधायक के रूप में हाजी मुन्ना सलाम विधानसभा पहुंचे थे। इसके बाद 2002 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के आम चुनाव में अपना दल को तीन सीटों से सफलता मिली थी

इलाहाबाद पश्चिमी से अतीक अहमद, नवाबगंज (अब फाफामऊ) से अंसार अहमद तथा वाराणसी की गंगापुर सीट (अब सेवापुरी) से सुरेंद्र सिंह पटेल ने चुनाव जीता था। लेकिन इन तीनों विधायकों को समाजवादी पार्टी के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव ने तोड़कर अपने पाले में कर लिया। इसके कारण डॉ. सोनेलाल पटेल ने तीनों को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद डॉ. सोनेलाल पटेल ने अपने जीवन काल में न तो खुद कोई चुनाव जीत पाए, उनकी पार्टी का कोई अन्य उम्मीदवार।

2009 में 17 अक्टूबर को एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इसके बाद पार्टी को आगेे ले जाने की जिम्मेदारी उनकी तीसरी बेटी अनुप्रिया पटेल को सौंपी गई। तब से लेकर आज तक यह पार्टी निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। अनुप्रिया पटेल 2012 के चुनाव में वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक चुनी गईं। इसके बाद पार्टी में कई झंझावात आए।

2014 में भाजपा के साथ गठबंधन हुआ। इसका परिणाम यह रहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल के दो सांसद भी चुन लिए गए। अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से तथा हरिवंश सिंह प्रतापगढ़ से। 2016 में पार्टी में दो फाड़ हो गया। अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने बेटी अनुप्रिया पटेल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद अनुप्रिया पटेल ने अपना दल सोनेलाल का गठन किया। इसके प्रथम अध्यक्ष प्रयागराज के जवाहर लाल पटेल बनाए गए। 2019 में पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में अनुप्रिया पटेल बाकायदा अध्यक्ष चुनी गईं।

उधर दूसरा धड़ा कृष्णा पटेल और डॉ. पल्लवी पटेल इस दौरान अपना दल कमेरावादी का गठन किया। एमपी-एमएलए बनने के लिए दूसरे दलों के सिंबल पर भी चुनाव लड़ा। कृष्णा पटेल में पार्टी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता न होने के कारण डॉ. सोनेलाल पटेल के पुराने अधिसंख्य साथी अनुप्रिया पटेल के साथ जुड़ते चले गए।

विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में पार्टी की सफलता को देखते हुए तेजी के साथ दूसरे लोग भी जुड़ने लगे। 2022 के चुनाव की ही बात करें तो कुल 12 विधायक चुनाव जीते हैं। इनमें  पांच कुर्मी, पांच अनुसूचित जाति, एक ब्राह्मण तथा एक स्वर्णकार जाति के हैं। इसी तरह से 2017 केे विधानसभा चुनाव में जीते नौ विधायकों में जातीय विविधता थी। प्रतापगढ़ में 2019 में उपचुनाव हुआ था, उसमें राजकुमार पाल अपना दल सोनेलाल से जीते थे।

2019 के लोकसभा चुनाव में एक खुद अनुप्रिया पटेल जीतीं तथा इस पार्टी से दूसरे सांसद पकौड़ी लाल कोल हैं। जब से पार्टी की कमान अनुप्रिया पटेल के हाथ में आई है, विधानसभा चुनाव में स्ट्राइक रेट भी अच्छा रहा है। लोकसभा चुनाव में तो यह सौ फीसद रहा।

एक जातीय दल को जमात की पसंद बनाने में अनुप्रिया पटेल ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। वह सामाजिक न्याय के हर मुद्दे पर संसद में तथा इसके बाहर मुखर रहती हैं। ओबीसी आरक्षण की बात हो या जातीय जनगणना। वह लगातार इस मुद्दे पर मुखर हैं। नीट में ओबीसी आरक्षण, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा, केंद्रीय व सैनिक विद्यालयों में प्रवेश में ओबीसी आरक्षण दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाली अनुप्रिया पटेल अभी जातीय जनगणना, केंद्र में अलग से ओबीसी कल्याण मंत्रालय, हाईकोर्टों व सुप्रीम कोर्ट में कोलेजियम सिस्टम को हटाकर आल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विसेज तथा देश के चारों स्तंभों में आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी के लिए हर मंच पर आवाज उठा रही हैं।

वह अपने पिता डॉ. सोनेलाल पटेल द्वारा दिए गए उस मंत्र को सिद्ध करने में जुटी हैं, जिसमें उन्होंने कहा था सारी समस्याओं का हल सत्ता है। सत्ता में रहेंगे, तभी बात का वजन होगा। यही कारण है कि जातीय पार्टी अपना दल में जमात का विश्वास तेजी से बढ़ रहा है। इसी कारण यह दल प्रदेश में तीसरा सबसे बड़ा बन गया है और इसे क्षेत्रीय दल का दर्जा भी चुनाव आयोग से मिल चुका है।

 

 


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