July 24, 2024 |

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बुंंदेलखंडः राजनीति के अखाड़े में एक और क्षेत्रीय राजनीतिक दल का ऐलान

Sachchi Baten

पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह बनाएंगे बुंदेलखंड लोकतान्त्रिक पार्टी

* बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई लड़ेगा नया राजनीतिक दल

* बुंदेलखंड क्षेत्र के लोकसभा क्षेत्रों में खड़े होंगे प्रत्याशी

* बुंदेलखंड में राजनीतिक दल अब तक रहे हैं असफल

लखनऊ (सच्ची बातें)। उप्र के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह भी राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। लम्बे सोच विचार और कशमकश के बीच गत दिनों महोबा में एक कार्यक्रम में उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बुंदेलखंड लोकतान्त्रिक दल बनाने की घोषणा की। इसका मुख्य एजेंडा उप्र व मप्र में बंटे बुंदेलखंड क्षेत्र के एकीकरण के साथ अलग बुंदेलखंड राज्य रहेगा।

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पार्टी लोकसभा चुनाव में उप्र व मप्र के बुंदेलखंड क्षेत्र में आने वाले लोकसभा क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार भी खड़े करेगी। बुंदेलखंड आंदोलन के पुरोधा और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक स्व. शंकरलाल मेहरोत्रा की पुण्यतिथि पर महोबा, बाँदा में आयोजित कार्यक्रमों में पूर्व डीजीपी ने अपना नज़रिया रखते हुए भावी कार्यक्रमों का ऐलान किया। कार्यक्रम बुंदेली समाज के बैनर तले आयोजित हुआ था।

इसी के साथ उप्र व मप्र में विभाजित बुंदेलखंड राज्य आंदोलन में एक और राजनीतिक पार्टी का उदय हो गया। बता दें कि 1989 में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के गठन के साथ ही अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग प्रबल हो उठी थी। हरिमोहन विश्वकर्मा और क्षेत्र के प्रमुख उद्योगपति शंकरलाल मेहरोत्रा ने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ 1989 में इसका गठन किया था और संसद में पर्चे फेंकने, उप्र व मप्र विधानसभाओं में पर्चे फेंकने, तीनों विधाई संस्थाओं के अनेक बार घेराव, प्रदर्शन, रेल रोको, रास्ता जाम जैसे आंदोलन इस संगठन ने किए और देश की राजधानी तक बुंदेलखंड राज्य आंदोलन का विस्तार किया।

मोर्चे ने नौजवानों के संगठन बुंदेलखंड गण परिषद को भी मोर्चे में विलय करा लिए और परिषद के अध्यक्ष अजय शर्मा को युवा मोर्चे की कमान सौंप दी। बाद में एक आंदोलन के दौरान रासुका लगने के बाद आंदोलन और संगठन कमजोर हुआ और 2001 में शंकरलाल के निधन के बाद आंदोलन सुस्त हो गया।

2003 में आंदोलन ने राजा बुंदेला, हरिमोहन विश्वकर्मा, अजय शर्मा जैसे आंदोलनकारियों की अगुवाई में आंदोलन ने फिर अंगड़ाई ली और किसान संसद, छात्र संसद, पदयात्राओं व रथयात्राओं आदि के साथ राजा बुंदेला को कांग्रेस के टिकट पर झाँसी -ललितपुर से लोकसभा का चुनाव भी लड़वाया, जिसमें उन्हें 1 लाख 31 हजार मत भी मिले। बाद में राजा बुंदेला पहले कांग्रेस और फिर भाजपा में चले गए, लेकिन बुंदेलखंड आंदोलन की कमान फिर भी थामे रहे।

फिलहाल बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा की कमान संस्थापक सदस्य हरिमोहन विश्वकर्मा के हाथ में है। अब पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह, जो खुद उप्र के बुंदेलखंड में बाँदा इलाके से आते हैं, ने इस मुद्दे को लेकर अलग पार्टी का ऐलान कर एक बार फिर से इस मुद्दे को गर्म करने का प्रयास किया है। सुलखान सिंह उप्र के डीजीपी पद से रिटायर्ड हुए हैं। लम्बे समय से वे राजनीति व सार्वजनिक क्षेत्र में आने का विचार बना रहे थे, जो नई पार्टी के ऐलान के साथ पूरा हो गया।

देखना यह है कि सुलखान सिंह के इस कार्य में कूदने और पार्टी के ऐलान के बाद बुंदेलखंड आंदोलन में कोई तेजी आती है कि नहीं। बुंदेलखंड आंदोलन में पहले भी राजनीतिक पार्टियों के गठन का लम्बा इतिहास रहा है। पूर्व मंत्री बादशाह सिंह ने बुंदेलखंड इंसाफ सेना, पूर्व सांसद व बैद्यनाथ के मालिक स्व. विश्वनाथ शर्मा ने बुंदेलखंड एकीकरण समिति, मप्र के पूर्व मंत्री दिवंगत महेन्द्र मानव, बाँदा के पूर्व विधायक दिवंगत देवकुमार यादव भी बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर राजनीतिक दल बना चुके हैं।

खुद बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा ने भी 1996 में स्वयं को राजनीतिक दल घोषित कर दिया और अनेकों चुनाव लड़े, पर उसे वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी उसने गैर राजनीतिक दल के रूप में पाई थी। हालांकि तब भी मोर्चे से समाजवादी नेता और खजुराहो के पूर्व सांसद लक्ष्मीनारायण नायक, पूर्व विधायक गौरीशंकर शुक्ला, मप्र के पूर्व मंत्री विट्ठलभाई पटेल, गंगाचरण राजपूत, बादशाह सिंह, बीहड़ की रानी फूलन देवी आदि का साथ व समर्थन हासिल था।

फिलहाल में बुंदेलखंड विकास दल, बुंदेलखंड क्रांति दल जैसे राजनीतिक दल बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर चुनाव लड़ते हैं, पर सफलता उनसे कोसों दूर हैं। खुद राजा बुंदेला भी 2009 में बुंदेलखंड कांग्रेस के नाम से राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ चुके हैं, पर शुरुआती दौर में उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी मोर्चे के संग रहकर मिली थी। बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए और बुंदेलखंड आंदोलन के लिए पार्टी के अंदर व बाहर संघर्ष कर रहे हैं।

ऐसे में सुलखान सिंह नई पार्टी को लेकर बुंदेली जनता का समर्थन कैसे हासिल कर पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर सबसे बड़ी दिक्क़त यह है कि बुंदेलखंडवासी बुंदेलखंड राज्य के लिए तो सहमत हैं, लेकिन ज़ब वोट देने या सड़क पर उतरने की बारी आती है तो पीछे हट जाते है। 34 साल के अब तक के आंदोलन में बुंदेली जनता ने सिर्फ बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के प्लेटफॉर्म पर ही सड़कों पर पूरे बुंदेलखंड के साथ दिल्ली, लखनऊ और भोपाल तक जंगी आंदोलन किये। अन्य संगठनों को आज भी 100 लोग जुटाने के लाले पड़ जाते है।

इस बारे में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हरिमोहन विश्वकर्मा कहते है कि बुंदेली जनता के सड़क पर न आने के दो बड़े कारण हैं। एक तो विभिन्न संगठनों व उनके नेताओं ने बुंदेलियों की भावनाओं से खेला और बुंदेलखंड आंदोलन के मुद्दे को उठाकर सांसद, विधायक बन गए। परन्तु जनप्रतिनिधि बनते ही बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा उनकी प्राथमिकताओं से गायब हो गया।

ऐसे में बुंदेली जनता हर बार स्वयं को छला हुआ महसूस करती रही और बुंदेलखंड आंदोलन के नाम पर चल रहे संगठन अब उसकी नज़र में राजनीतिक दुकानों से अधिक कुछ भी नहीं। ऐसे में वह निरपेक्ष है, पर अगर कोई ईमानदारी से बुंदेलखंड राज्य की मांग आगे बढ़ाता है तो उसे समर्थन मिलना तय है।

दूसरा कारण बुंदेलखंड की गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ापन है, जिसके चलते उसे दो जून की रोटी कमाना और परिवार का भरण पोषण करना है। बुंदेलखंड में सिर्फ एक फसल होती है और बाकी टाइम वे रोजी रोटी कमाने परदेश चले जाते है। सिर्फ फ़सल कटाई के वक़्त घर लौटते हैं। ऐसे में बुंदेलखंड के लिए उनके पास समय नहीं। ऐसे में बुंदेलियों को आंदोलन से जोड़ना सुलखान के लिए आसान नहीं होगा।

कौन हैं सुलखान सिंह

पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह 2017 में योगी सरकार के दौरान प्रदेश के डीजीपी रहे हैॆ।

बुंदेलखंड राज्य

बुंदेलखंड राज्य की मांग 1939 से है। तब टीकमगढ़ के राजा वीरसिंह जूदेव ने इसकी अगुवाई की थी। आजादी के शोर में यह मांग दबकर रह गई। किन्तु 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के लिए बने पनिककर आयोग ने बुंदेलखंड राज्य के गठन की तीव्र अनुशंसा की लेकिन नेहरु सरकार ने आयोग की सलाह पर तवज्जो न देकर इसकी जगह मप्र व उप्र जैसे राज्यों का गठन कर दिया और बुंदेलखंड के जिलों को अवैज्ञानिक व अप्राकृतिक तरीके से दोनों राज्यों में बाँट दिया। इन्हीं जिलों को मिलाकर बुंदेलखंड राज्य की मांग की जा रही है। इनमें उप्र के चित्रकूट, बाँदा, हमीरपुर, महोबा, जालौन, झाँसी व ललितपुर और मप्र के दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, मैहर, दमोह, सागर, अशोकनगर, कटनी, निवाड़ी आदि जिले शामिल है। ये सभी जिले विंध्याचल की तलहटी में हैं जो बुंदेलखंड कहलाते है जबकि विंध्याचल के उस पार स्थित जिले बघेलखंड और महाकौशल का हिस्सा है। बुंदेलखंड आंदोलनकारी इसे एक भौगोलिक, सांस्कृतिक व आर्थिक क्षेत्र मानते है और उनका मानना हैं कि 1956 में बंटवारे के बाद बुंदेलखंड के बुरे दिन शुरु हुए। वास्तव में आजादी के पूर्व बुंदेलखंड 6 माह के लिए राज्य था भी जिसकी नौगांव राजधानी थी और कामताप्रसाद सक्सेना पहले मुख्यमंत्री। पर बाद में पहले इसे विंध्य प्रदेश व फिर मप्र व उप्र में बाँटा गया।

नई पार्टी का स्वागत किया

बुंदेलखंड आंदोलन के अगुवा रहे अब भाजपाई व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री राजा बुंदेला ने सुलखान सिंह की घोषणा का स्वागत किया है और कहा है कि सुलखान सिंह इस क्षेत्र के नागरिक है। उन्हें बहुत पहले यह कदम उठाना चाहिए था। बुंदेलखंड के सेवानिवृत नौकरशाहों को अगर वे अपनी पार्टी से जोड़ने में सफल रहते है तो यह बुंदेलखंड के विकास के लिए बेहतरीन होगा बल्कि बुंदेलखंड आंदोलन में जनता को जोड़ने और सरकार पर दबाव बनाने में भी सहायक होगा।


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