July 24, 2024 |

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काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह से जुड़ी अद्भुत, अकल्पनीय व अविश्वसनीय घटना

Sachchi Baten

बेहोश किए बिना हुआ था अपेंडिक्स का ऑपरेशन, ब्रिटेन के सर्जन रह गए थे दंग

चार घंटे के ऑपरेशन दौरान ‘ध्यान’ में रहे काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह

राजेश पटेल, रामनगर/वाराणसी (सच्ची बातें)। आज ऐसी घटना का जिक्र किया जा रहा है, जिस पर आप सभी सहसा विश्वास ही नहीं करेंगे, लेकिन यह सौ फीसद सत्य है। बात काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह से जुड़ी है। वह  1859 से 1931 तक बनारस के शासक रहे।

महाराज प्रभुनारायण सिंह को अपेंडिक्स हो गया था। उनकी जान खतरे में थी। ऑपरेशन जरूरी था। वर्ष 1908  के आसपास इसके लिए ब्रिटेन से पांंच विशेषज्ञ सर्जन बुलाए गए थे। ऑपरेशन के पहले चिकित्सकों ने उनको बेहोश करना चाहा तो काशी नरेश ने  साफ मना कर दिया था। बिना बेहोश हुए ही ऑपरेशन कराया।

चूंकि काशी नरेश अध्यात्म व विज्ञान दोनों को बराबर महत्व देते थे। चिकित्सकों नेे बेहोश करने के लिए उनको काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माने। चिकित्सक असमंजस में पड़ गए थे। लेकिन प्रभुनारायण सिंह काशी नरेश थे, सो उनकी बात माननी भी थी।

काशी नरेश ने चिकित्सकों से कहा कि आपलोग बेहिचक ऑपरेशन करें। जब तक ऑपरेशन चलता रहेगा, वह ध्यान में रहेंगे। चिकित्सकों के सामने भी इस तरह का पहला केस था, जो अपेंडिक्स का ऑपरेशन मरीज को बेहोश किए बिना करना था।

चूंकि ऑपरेशन न करने पर राजा की जान को खतरा था, इसलिए चिकित्सकों ने काशी नरेश के आदेश के अनुसार बेहोश किए बिना ही उनका ऑपरेशन शुरू कर दिया। तमाम जगह पढ़ने को मिलता है कि डॉक्टरों ने काशी नरेश की थोड़ी-सी चीर-फाड़ की और देखा कि उनकी क्या स्थिति है। लेकिन तब तक वह आंख बंद कर ध्यान में जा चुके थे।

धीरे-धीरे ऑपरेशन आगे बढ़ा और अपेंडिक्स निकाल ली गई। काशी नरेश इस तरह ध्यान में रहे, जैसे उन्हें पता ही ना चल रहा हो कि उनका ऑपरेशन हो रहा है। डॉक्टरों की हैरानी की कोई सीमा नहीं थी। करीब चार घंटे तक ऑपरेशन चला। बाद में डॉक्टरों ने कहा कि यह मनुष्य जाति के इतिहास में शायद पहला मामला है, जब बिना बेहोश किए मरीज की अपेंडिक्स निकाली गई। देखते ही देखते भारत ही नहीं, दुनियाभर में यह मामला चर्चा का विषय बन गया।

बाद में काशी नरेश से इसका राज़ पूछा गया। आखिर कैसे उन्होंने ऐसा ध्यान लगाया कि उनका इतना बड़ा ऑपरेशन हुआ और वह टस से मस ना हुए?

उन्होंने कहा, ‘मैं शरीर नहीं हूं। मैं साक्षी हूं। मैं ऑपरेशन के दौरान अपने साक्षी भाव में रहा। मैं महसूस करता रहा कि अपेंडिक्स निकाली जा रही है। पेट फाड़ा जा रहा है। सर्जिकल नाइफ शरीर पर चल रही है, लेकिन उस समय मैं सिर्फ देखने वाला था। मेरा शरीर मुझसे अलग था। मैं यूं देखता रहा, जैसे किसी और के शरीर का ऑपरेशन हो रहा हो। बुद्धत्व को प्राप्त हो चुके व्यक्ति को कोई दुख नहीं होता, क्योंकि दुख तभी होते हैं, जब आप ख़ुद को शरीर और मन मानते हैं। आप आत्मा हैं और आत्मा का कोई दुख नहीं होता।’

ओशो ने इस घटना का जिक्र इस तरह से किया है-

ओशो द्वारा इस घटना  के जिक्र को श्री दादूवाणी दर्शन ब्लॉगपोस्ट पर सौरभ जैन का आभाार जताते हुए लिखा गया है कि काशी नरेश महाराज प्रभूनारायण‌सिंह का एक ऑपरेशन हुआ। पांच डॉक्टर यूरोप से ऑपरेशन के लिए आए। पर काशी के नरेश ने कहा कि मैं किसी तरह का मादक-द्रव्य छोड़ चुका हूं; मैं ले नहीं सकता। तो मैं किसी तरह की बेहोश करने वाली कोई दवा, कोई इंजेक्शन, वह भी नहीं ले सकता, क्योंकि मादक-द्रव्य मैंने त्याग दिए हैं। न मैं शराब पीता हूं, न सिगरेट पीता हूं, चाय भी नहीं पीता।

तो इसलिए ऑपरेशन तो करें आप–अपेंडिक्स का ऑपरेशन था, बड़ा ऑपरेशन था–लेकिन मैं कुछ लूंगा नहीं बेहोशी के लिए। डाक्टर घबड़ाए, उन्होंने कहा, यह होगा कैसे ? इतनी भयंकर पीड़ा होगी, और आप चीखे-चिल्लाए, उछलने-कूदने लगे तो बहुत मुश्किल हो जाएगी ! आप सह न पाएंगे। उन्होंने कहा कि नहीं, मैं सह पाऊंगा। बस इतनी ही मुझे आज्ञा दें कि मैं अपना गीता का पाठ करता रहूं।
तो उन्होंने प्रयोग करके देखा पहले। उंगली काटी, तकलीफें दीं, सुइयां चुभायीं और उनसे कहा कि आप अपना…वे अपना गीता का पाठ करते रहे। कोई दर्द का उन्हें पता न चला। फिर ऑपरेशन भी किया गया। वह पहला ऑपरेशन था पूरे मनुष्य-जाति के इतिहास में, जिसमें किसी तरह के मादक-द्रव्य का कोई प्रयोग नहीं किया गया। काशी-नरेश पूरे होश में रहे। ऑपरेशन हुआ। डाक्टर तो भरोसा न कर सके। जैसे कि लाश पड़ी हो सामने, जिंदा आदमी न हो, मुर्दा आदमी हो।
ऑपरेशन के बाद उन्होंने पूछा कि यह तो चमत्कार है, आपने किया क्या ? उन्होंने कहा, मैंने कुछ किया नहीं। मैं सिर्फ होश सम्हाले रखा। और गीता जब मैं पढ़ता हूं, इसे जन्मभर से पढ़ रहा हूं, और जब मैं गीता पढ़ता हूं…और यही पाठ का अर्थ होता है। पाठ का अर्थ ऐसा नहीं होता कि बैठे हैं, नींद आ रही, तंद्रा आ रही, दोहराए चले जा रहे हैं; मक्खी उड़ रहीं और गीता पढ़ रहे हैं। पाठ का यह मतलब नहीं होता।
पाठ का अर्थ होता है बड़ी सजगता से, कि गीता ही रह जाए, उतने ही शब्द रह जाएं, सारा संसार खो जाए…तो उन्होंने कहा, गीता के पाठ से मुझे होश बनता है, जागृति आती है। बस, उसका मैं पाठ जब तक करता रहूं तब तक मुझसे भूल-चूक नहीं होती। तो मैं उसे दोहराता रहूं तो फिर शरीर मुझसे अलग है। ना हन्यते हन्यमाने शरीरे। तब मैं जानता हूं कि शरीर को काटो, मारो, तो भी तुम मुझे नहीं मार सकते। नैनं छिंदंति शस्त्राणि। तुम छेदो शस्त्रों से, तुम मुझे नहीं छेद सकते। बस इतनी मुझे याद बनी रही, उतना काफी था; मैं शरीर नहीं हूं।
हां, अगर मैं गीता न पढ़ता होता तो भूल-चूक हो सकती थी। अभी मेरा होश इतना नहीं है कि सहारे के बिना सध जाए। पाठ का यही अर्थ होता है। पाठ का अर्थ अध्ययन नहीं है, पाठ का अर्थ गीता को दोहराना नहीं है, पाठ का बड़ा बहुमूल्य अर्थ है। पाठ का अर्थ है, गीता को मस्तिष्क से नहीं पढ़ना, गीता को बोध से पढ़ना। और गीता पढ़ते वक्त गीता जो कह रही है उसके बोध को सम्हालना। निरंतर-निरंतर अभ्यास करने से, बोध सम्हल जाता है। पर काशी-नरेश को भी डर था, अगर सहारा न लें तो बोध शायद खो जाए।

 


Sachchi Baten

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