July 20, 2024 |

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आरएसएस प्रमुख भागवत के बाद अब इंद्रेश कुमार का भाजपा पर वार

Sachchi Baten

भाजपा पर बेहद आक्रामक नजर आ रहा संघ, अंदरूनी घमासान तेज होने के संकेत!

-भागवत के बाद अब इन्द्रेश कुमार की भाजपा पर सीधे सख्त टिप्पणी

-कहा, अहंकारी पार्टी 240 पर सिमट गई

-संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और मुस्लिम मंच के संयोजक हैं इन्द्रेश

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन दिनों भारतीय जनता पार्टी पर बेहद हमलावर नजर आ रहा है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में भाजपा के बारे में एक आलोचनात्मक टिप्पणी की थी, अभी इस पर मंथन हो ही रहा था कि आरएसएस के एक और वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने 2024 के लोकसभा चुनावों में बहुमत हासिल करने में विफलता के बाद भाजपा के प्रति तीखी टिप्पणी की है।

उन्होंने एक बयान दिया है कि आखिर अहंकार करने वाली पार्टी 240 पर सिमट गई। इन्द्रेश कुमार की टिप्पणी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया दावे का अनुसरण करती है कि एक ‘सच्चे सेवक’ में अहंकार नहीं होता है। भागवत की भावना को दोहराते हुए, कुमार ने अपने भाषण में ‘अहंकार’ पर जोर दिया। उन्होंने संकेत दिया कि भाजपा अपनी भक्ति के बावजूद अपने अहंकार के कारण 240 सीटों पर सिमट गई, जबकि राम में आस्था न रखने वालों की संख्या 236 पर सिमट गई। ये बयान भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक, आरएसएस के बीच बढ़ती दरार को उजागर करता है।

चुनाव से पहले एक अंग्रेजी अख़बार से बात करते हुए भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि भाजपा, परिपक्व हो गई है, अब आरएसएस से स्वतंत्र रूप से काम करती है। यही नहीं, उन्होंने आरएसएस को केवल एक सांस्कृतिक मोर्चा कहा था, तब से दोनों के बीच का तनाव स्पष्ट है। इसी के बाद लोकसभा चुनाव में जिलों में न तो संघ और भाजपा की समन्वय समितियां दिखीं और न ही डैमेज कंट्रोल के लिए बैठकें हुईं।

भाजपा ने प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तैयार करने तक में भी संघ से परामर्श नहीं लिया। लिहाजा संघ ने भी खुद को अपने वैचारिक कार्यक्रमों तक ही समेटे रखा। भाजपा ने संघ परिवार की सलाह की अनदेखी कर एक के बाद एक कई ऐसे फैसले कर डाले, जिनसे संगठन की साख और सरोकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ना लाजिमी था, इसलिए संघ ने भी अपनी भूमिका समेट ली।

अयोध्या में श्रीरामलला के प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर भी कुछ मतभेद उभरे। संघ ने कौशांबी, सीतापुर, रायबरेली, कानपुर, बस्ती, अंबेडकरनगर, जौनपुर, प्रतापगढ़ सहित प्रदेश की लगभग 25 सीटों के उम्मीदवारों पर असहमति जताई थी। साथ ही बड़े पैमाने पर दूसरे दलों के लोगों को भाजपा में शामिल करने पर भी नाराजगी व्यक्त की थी। संघ ने भाजपा में दूसरे दलों के दागी और अलोकप्रिय चेहरों को शामिल करने का भी विरोध किया, पर उसकी सलाह नहीं मानी गई। लिहाजा संघ उदासीन हो गया।

भाजपा का चुनाव प्रबंधन तो पहले से ही कागजों पर था। संघ भी उदासीन हुआ तो ज्यादातर स्थानों पर न तो भाजपा के वोटरों को निकालने वाले दिखे और न उन्हें समझाने वाले। ज्यादातर मतदान केंद्रों पर 2014, 2019, 2017 और 2022 वाला प्रबंधन नहीं दिखा। जबकि संघ ने चुनाव की घोषणा के एक साल पहले ही अपने वैचारिक कार्यक्रम के तहत जनता से संवाद शुरू कर दिया था। चुनाव की घोषणा होने तक हर लोकसभा क्षेत्रों में एक-एक लाख बैठकें हो चुकी थीं।

इसके तहत संघ के जमीनी कार्यकर्ता 10-20 परिवारों के साथ बैठकें करके मतदाताओं को मतदान के लिए जागरूक करने, सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद के एजेंडे पर हुए कार्यों की चर्चा कर माहौल बनाए थे। लेकिन भाजपा संघ की इस कवायद का भी फायदा नहीं उठा पाई। संघ से दूरी बनाने का दुष्परिणाम यह भी रहा कि जमीनी स्तर पर काम करने वाला भाजपा का संगठन भी पूरी तरह से सक्रिय नहीं रहा। माना जा रहा है कि संघ से बेहतर समन्वय नहीं बनने की वजह से भाजपा की अधिकांश बूथ कमेटियां व पन्ना प्रमुख भी निष्क्रिय बैठे रहे। समन्वय नहीं होने की वजह से दोनों तरफ के कार्यकर्ता उदासीन रहे। नतीजा यह हुआ कि तमाम घरों व परिवारों तक पर्चियां तक नहीं पहुंच पाई और आखिरी नतीजा सबने देख लिया।


Sachchi Baten

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1 Comment
  1. Vinay singh says

    BjpkokoRSS,seHi jitMilti hai.BJP.Ko Nahi Bulnaa.Chaahiye.jai Sri Ram.

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