July 20, 2024 |

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जनप्रतिनिधियों को सलाह, डोभी आने-जाने के लिए करें हेलीकॉप्टर का प्रयोग

Sachchi Baten

किसानों ने क्यों कहा, 2024 में ‘डबल इंजन’ के साथ-साथ पूरी ‘बोगी’ भी पलट देंगे!

संतोषदेव गिरी/विनोद कुमार, वाराणसी/डोभी। वाराणसी से आजमगढ़-गोरखपुर मार्ग पर जैसे ही धरसौना बाजार के बाद दानगंज की ओर आगे बढ़ते हैं वैसे ही जगह-जगह दीवारों से लेकर बिजली के खंभों पर लिखा हुआ यह स्लोगन “सुझाव- माननीय सांसद, मंत्री, विधायक जी, डोभी में आने-जाने के लिए ‘हेलीकॉप्टर’ का प्रयोग करें” कौतूहल का विषय बना हुआ है। इधर से गुजरने वाले लोगों की नज़र पड़ते ही हर कोई इसे पूरा पढ़ने के बाद मोबाइल के कैमरे में कैद करने को विवश हो जाता है। तकरीबन 16 किलोमीटर तक (वाराणसी से आजमगढ़-गोरखपुर जाते वक्त जौनपुर सीमा क्षेत्र में) की दूरी में जगह-जगह लिखा हुआ यह स्लोगन हर जगह लिखा हुआ दिखाई दे जाता है।

इस स्लोगन को देखने पढ़ने के मन में एक ख्याल आने लगता है कि आखिरकार ऐसा क्यों लिखना पड़ा है? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी हुई है? इसे जानने और समझने के लिए जब हमने इलाके के कुछ लोगों से मसलन, दुकानदारों, स्थानीय लोगों से जानकारी ली तो हमें जो बताया गया वह वास्तव में बेहद मार्मिक, सोचनीय और सरकार के ‘किसान हितैषी’ होने के दावों के उलट किसानों की पीड़ा, आक्रोश से भरा हुआ सवाल रहा है।

दरअसल, इस स्लोगन के पीछे क्षेत्र के किसानों की पीड़ा छुपी हुई है वह भी कोई एक-दो किसानों की नहीं बल्कि तकरीबन चार हजार किसानों की जो आक्रोशित और आंदोलित होकर 21 फरवरी 2024 को विशाल आंदोलन की घोषणा कर चुके हैं। यह आंदोलन क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और राष्ट्रीय राजमार्ग NHI-223 के खिलाफ है। पीड़ित किसान कहते हैं आंदोलन जोरदार होगा, जबरदस्त होगा। तो आईए जानते हैं क्या है पूरा मामला, और किसानों को क्यों आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ रहा है?

देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से गोरखपुर वाया आजमगढ़ होते हुए टू लेन की सड़क को फोरलेन (हाईवे) में परिवर्तित कर हाईवे निर्माण को मूर्त रूप देने के लिए किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया गया था। वाराणसी और आजमगढ़ के किसान मुआवजा पाने में तो सफल रहे, लेकिन जौनपुर की सीमा में तकरीबन 16 किलोमीटर की परिधि में आने वाले किसान 2012 से मुआवजे की रकम पाने से दूर बने हुए हैं। किसानों की माने तो उन्हें मुआवजा तो मिलना दूर रहा है राष्ट्रीय राजमार्ग-223 के अधिकारियों की मनमानी की वजह से उन्हें मुकदमे में उलझा दिया गया है।

वाराणसी से आजमगढ़, गोरखपुर को जोड़ने वाली सड़क जिसे प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री को जोड़ने वाली सड़क भी कहा जाता है, की जौनपुर सीमा में राष्ट्रीय राजमार्ग 223 ने तकरीबन चार हजार किसानों की भूमि को अधिग्रहित तो किया, लेकिन मुआवजा आज तक नहीं दिया है। राष्ट्रीय राजमार्ग के अधिकारी मुआवजा देने के बजाए लगभग 4000 किसानों को पार्टी बनाकर हाई कोर्ट इलाहाबाद में मुकदमा कर दिए हैं। किसानों को नोटिस भी मिला हुआ है। 4000 किसान जो डोभी, जौनपुर के हैं बिना किसी अपराध के मुकदमा झेलने को बाध्य है।

सड़क बनी नहीं टोल प्लाजा तैयार हो गया

राष्ट्रीय राजमार्ग 2023 द्वारा सड़क का पूर्ण निर्माण भी नहीं किया है। हद की बात तो यह है कि आधी अधूरी सड़क बनाकर टोल प्लाजा भी प्रारंभ करने की तैयारी कर ली गई जो किसानों के भारी विरोध प्रदर्शन के बाद रुका हुआ है। आश्चर्य की बात है कि टोल प्लाजा जहां (मोढ़ैला, जौनपुर) प्रस्तावित था वहां न तैयार कर वाराणसी के बलरामगंज, दानगंज में तैयार करा दिया गया है। किसान इसका भी शुरू से विरोध करते आ रहे हैं।

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जहां पर टोल प्लाजा बना है उसके दो किमी के बाद आगे सड़क ही नहीं बनी है। ऐसे में टोल प्लाजा के औचित्य पर भी सवाल खड़ा हो रहा है। किसान इतनी कम दूरी पर टोल के औचित्य को भी ग़लत ठहराते हैं। यह अपने आप में यह एक घोर आश्चर्य ही कहा जाएगा कि आधे अधूरे हाईवे पर टोल प्लाजा वसूली की तैयारी कर ली गई, जिसकी खबर तक शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को है ना ही किसानों के जरिए जानकारी होने पर इस पर NHI के अधिकारियों से कोई सवाल जवाब हुआ।

किसानों का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्ग के अधिकारी मनमानी तरीके से काम कर रहा हैं। किसानों को कोर्ट कचहरी में उलझा कर अधूरी सड़क का निर्माण करवा रहे हैं जिसे लेकर किसान आंदोलित हैं, उग्र हैं। जौनपुर सीमा अंतर्गत डोभी विकासखंड के तकरीबन 4000 किसानों को नोटिस जारी हुआ है 16 किमी की जमीन आजमगढ़ बॉर्डर के कंजहित से लेकर जौनपुर-वाराणसी सीमा के दानगंज तक के किसान बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। जिन्हें आज भी मुआवजे की दरकार है। तकरीबन 54 हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य एवं आबादी, कमर्शियल योग्य भूमि का अधिग्रहण हाईवे निर्माण के लिए किया गया है। किसान कहते हैं “भूमि अधिग्रहण करने के बाद जब बारी मुआवजा देने की आई तो राष्ट्रीय राजमार्ग 223 के अधिकारी मनमानी पर उतर आए। किसान नहीं माने तो उन्हें हाईकोर्ट में घसीट कर उलझा दिया गया है।”

डोभी, जौनपुर के किसान नेता अजीत सिंह कहते हैं “उत्तर प्रदेश के 826 ब्लाकों में डोभी ऐसा एकलौता ब्लाक है जहां के किसानों को खुद की भूमि के मुआवजे के लिए परेशान होना पड़ रहा है। वह कहते हैं राष्ट्रीय राजमार्ग 223 का प्रकरण 2012 से लंबित चला आ रहा है। आजमगढ़, वाराणसी के किसानों को उनकी भूमि का उचित मुआवजा मिल गया है, लेकिन डोभी, जौनपुर के किसानों को ना ही मुआवजा मिला है और ना ही सड़क बनी है। मुआवजे के बदले राष्ट्रीय राजमार्ग ने चार हजार किसानों को पार्टी बनाकर हाईकोर्ट में केस कर दिया है।”

वह आगे भी बोलते हैं “यहां डबल इंजन के साथ-साथ पूरी बोगी भी है जनता की समस्याओं को उठा नहीं पा रहे हो तो इसे बदल देना ही चाहिए।”

वाराणसी जहां आधे अधूरे हाईवे पर टोल प्लाजा बनाया गया है वह इलाका भी केन्द्रीय मंत्री, महेन्द्र नाथ पांडेय के संसदीय क्षेत्र के अजगरा विधानसभा क्षेत्र में होने के बाद भी किसानों को एक दशक से ज्यादा समय से मुआवजे की मांग का ना तो समाधान हो सका है और ना ही उन्हें मिली नोटिस से छुटकारा मिल पाया है। ऐसे में किसानों ने एकजुट होकर 2024 के लोकसभा चुनाव में इंजन ही नहीं पूरी सरकार का बोगी को पलट देने का ऐलान किया है। बल्कि सांसद विधायक और मंत्री को आगाह भी किया है कि “डोभी में आने-जाने के लिए हेलिकॉप्टर का उपयोग करें।” कारण- अधूरी सड़क के कारण दुर्घटना संभावित क्षेत्र, आपकी (सांसद विधायक और मंत्री) नज़र में की जान की कीमत भले ही ना हो परन्तु जनता आपके जान की कीमत बखूबी समझती है।”

NHI द्वारा किसानों का किया जा रहा है उत्पीड़न

किसान नेता रामेश्वर सिंह “जनचौक” को बताते हैं कि हाईवे निर्माण के लिए 2012 में अधिसूचना जारी किया गया था। इसमें NHI के अधिकारियों ने बिना किसानों को भरोसे में लिए पहले तो मनमानी की, बात नहीं बनी तो किसानों को फर्जी मुकदमे में फंसा कर उनका उत्पीड़न किया जा रहा है। अब तक सैकड़ों किसान दम तोड़ चुके हैं। कितने किसान मुआवजे के अभाव में बहन बेटियों की शादी नहीं कर सकें है। बीमारी परेशानी में उन्हें दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है।”

रामेश्वर सिंह NHI के अधिकारियों पर बिफरे हुए कहते हैं”यह सरकार को गुमराह कर रहे हैं। देश व प्रदेश की सरकार के लिए यह शुभ नहीं है। NHI सरकार और किसानों को लड़ाने के साथ ही साथ फर्जी मुकदमें में किसानों को फंसाकर सरकार के खिलाफ लड़ा-भड़का रही है। यह सरकार का ही महकमा है, बावजूद इसकी जोर जबरदस्ती भरी नीतियों से किसान त्रस्त हैं।” वह बताते हैं कि 2012 में जब भूमि अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी हुई थी तो 3539 किसान इसके दायरे में थे जिनमें से काफी लोगों की मौत हो चुकी है। महेंद्र प्रजापति का कहना है कि “बौद्धिक किसान एक दशक से ज्यादा समय से परेशान है। सरकार व NHI किसानों की समस्यायों को सुलझाने के बजाए उन्हें परेशान ही करती आई है। ऐसे में सरकार के अधीन यह महकमा सरकार और किसानों को कैसा संदेश देना चाहता है? क्या किसानों की आय को दुगुना करने का यही तरीका है?”

देश के लिए शहादत देने वालों में अग्रणी रहा है डोभी

जिस डोभी (जौनपुर) क्षेत्र के किसान मुआवजा पाने के लिए परेशान हैं कभी उसी क्षेत्र के नौजवानों ने देश की आजादी के लिए अपनी सहादत तक देने से पीछे नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि जलियांवाला बाग से पहले डोभी के लोगों ने देश की आजादी के लिए शहादत दी है। क्षेत्र के जयप्रकाश राम “जनचौक” को बताते हैं कि “1857 के आंदोलन में डोभी के किसानों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। आज उसी डोभी के किसानों को समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।” किसानों की आय दुगनी करने वाले बयान पर तंज़ कसते हुए वह कहते हैं “सरकार किसानों की आय को दुगुनी करने की बात करती है लेकिन यहां हम पांच किलो राशन में जीवन काटने को विवश हैं।”

विरोध के प्रतीक स्वरूप लगा हेलिकॉप्टर हुआ गायब

वाराणसी-आजमगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग के मुआवजे को लेकर डोभी के किसानों के सब्र का बांध टूटता हुआ साफ देखा जा सकता है। किसान लंबित पड़े मुआवजे की, फर्ज़ी मुकदमे को वापस लेने की मांग को लेकर अनोखे तरीके अपनाकर जनप्रतिनिधियों का ध्यान आकृष्ट कराने के लिए सुझाव के श्लोगन के साथ हेलीकाप्टर का डेमू बनाकर भरपूर प्रयास भी किए, हालांकि श्लोगन व हेलीकाप्टर मीडिया की सुर्खियां बनते ही रातों रात हेलीकाप्टर को गायब करने के साथ ही श्लोगन पर कालिख पोत दी गई। किसान हेलीकाप्टर को लेकर जद्दोजहद कर ही रहे थे कि शासन-प्रशासन से लगाए जनप्रतिनिधियों और राष्ट्रीय राजमार्ग की होती किरकिरी बढ़ने लगी थी कि इसी बीच अचानक से डेमू के तौर पर खड़ा किया गया हेलीकॉप्टर ग़ायब हो जाता है। इससे किसानों के आक्रोश को और भी बल मिला है।

संसद सत्र में सांसद के सवाल पर किसानों में नाराजगी

इसी बीच एक पत्रक सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है। पत्रक संसद सत्र के भू-अधिग्रहण के लिए मुआवजा प्रश्न संख्या-1046 का है, जिसमें मछलीशहर (जौनपुर) सांसद बीपी सरोज ने डोभी के किसानों के लंबित पड़े मुआवजे को लेकर सवाल पूछा है। सवाल पर परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने अपने ज़बाब में केवल ‘क से ग’ तक का जवाब देते हुए मामला न्यायलय में विचाराधीन बताया। जिसको लेकर डोभी के किसानों का संसद सत्र के आखिरी दिनों में भी आस टूटने से भारी आक्रोश रहा है।

किसानों का आरोप है कि सांसद ने जो सवाल संसद सत्र में उठाया है वह सही तरीके से नहीं उठाया गया। किसानों के हाईकोर्ट अर्जी लगाने का उल्लेख है जबकि एनएचआई किसानों के विरुद्ध हाई कोर्ट में गई है। साथ ही परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मामले को न्यायालय में विचाराधीन होने की बात तो कही मगर न्यायालय में कौन किसको पार्टी बनाया उसको लेकर ज़बाब में उल्लेख नहीं किया जाना बड़ा सवाल खड़ा करता है।

जनता जनप्रतिनिधि चुनकर संसद में भेजती है जनमानस हितों का सवाल उठाने के लिए, लेकिन सांसद (मछलीशहर) जी के सवालों से ऐसा लग रहा है जैसे सांसद बीपी सरोज जनता और किसानों के बीच में बैठते ही नहीं हैं? अगर किसानों के बीच में बैठते तो पूरी जानकारी होती मगर बगैर जानकारी के अंजान तरीके से संसद में अपना सवाल लगाना सही नहीं है। सांसद के 5 साल के कार्यकाल में यह नहीं पता चला कि किसानों को मुआवजा मिला है या नहीं मिला है।

क्या सांसद को यह नहीं पता कि किसानों के ऊपर राष्ट्रीय राजमार्ग ने जिला जज के फैसले को न मानते हुए लगभग 4000 किसानों को पार्टी बनाकर माननीय न्यायालय हाईकोर्ट इलाहाबाद में मुकदमा किया है? और लगभग 600 ग्राम के किसानों को नोटिस भिजवाया गया है? सांसद को यह कहना चाहिए कि देश के अन्नदाताओं के ऊपर मुकदमा का होना अपने आप में अपमानित करने वाला है। अगर सांसद चाहते तो एनएचआई के अधिकारियों को लेकर किसानों के साथ बैठकर आपसी राय मशवरा करके किए गए मुकदमे को वापस लेते हुए किसानों को उचित मुआवजा देकर सड़क निर्माण देश हित में करा सकते थे।

सांसद को किसानों के चल रहे आंदोलन और राष्ट्रीय राजमार्ग के बीच की लड़ाई को सीधे दर्शाते हुए सवाल लगाना चाहिए था कि क्या राष्ट्रीय राजमार्ग 233 के पूर्ण निर्माण व अभिग्रहण किए भूमी का मुआवजा दिए अधूरे सड़क का टोल टैक्स वसूलना जायज है? राष्ट्रीय राजमार्ग अपने फायदे के लिए टोल प्लाजा का निर्माण बलरामगंज में तैयार कर टोल वसूलने की तैयारी में है क्या यह उचित है ? टोल वसूलने की इतनी ही जल्दबाजी थी तो किसानो को कोर्ट में घसीटने की क्या जरूरत थी?

संसद सत्र में सांसद बीपी सरोज के सवाल

(क) क्या उत्तर प्रदेश के जौनपुर में मछलीशहर के लगभग 20 गांव के 4000 किसानों, जिनकी भूमिका अधिग्रहण राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 233 की विस्तारण परियोजना के लिए किया गया था, को अभी तक मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया है, यदि हां तो तत्संबंधी ब्योरा क्या है तथा यदि नहीं तो इसके क्या कारण,(ख) क्या यह सच है कि किसानों ने उन्हें उचित मुआवजे का भुगतान न किए जाने के संबंध में माननीय उच्च न्यायालय में अर्जी लगाई है और यदि हां तो तत्संबंधी क्या है तथा इसके  क्या कारण है (ग) किसानों की दुर्दशा को देखते हुए एनएचआई 233 हेतु अधिग्रहित भूमि के लिए उन्हें उचित मुआवजा देने हेतु सरकार द्वारा क्या कार्रवाई की जा रही है और, (घ) मुआवजे का भुगतान कब तक किए जाने की संभावना है?

पत्र के संबंध में परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का जवाब

(क) से (ग) जौनपुर जिले (मछलीशहर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में आने वाले) के लगभग 20 गांव के ऐसे किसी भी किसान को कोई भुगतान नहीं किया गया है जिनकी भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग 233 पैकेज (।।।) के गोमती नदी पुल से वाराणसी खंड को चार लेने का बनाने से प्रभावित हो रही है। इसके अतिरिक्त भारतीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा अधिसूचित भूमि का वास्तविक कब्जा नहीं किया गया है। भूमि मालिक भूमि अधिग्रहण पुनर्वास व पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 में उचित मुआवजा और पारदर्शिका के अधिकार के प्रावधानों के विपरीत औसत के तरीके के आधार पर आर्थिक मुआजे की मांग कर रहे हैं यह मामला माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

आक्रोशित किसान 21 फरवरी को टोल प्लाजा पर देंगे धरना

राष्ट्रीय राजमार्ग – 223 के नादरशाही फरमान के खिलाफ विशाल धरना प्रदर्शन का ऐलान कर चुके किसानों, ग्रामीणों को व्यापक समर्थन मिलने के साथ-साथ सड़क और सरकार के खिलाफ आक्रोश भी देखने को मिलने लगा है। एक दशक से ज्यादा समय से भूमि के मुआवजे की मांग को लेकर मुकदमें की पीड़ा झेल रहे हजारों किसानों के सब्र का पैमाना छलकने को आतुर दिखलाई देने लगा है। विशाल आंदोलन की घोषणा कर चुके मुआवजे की मांग को लेकर NHI 2023 के अधिकारियों की हद्धार्मिता के चलते मुकदमे और आर्थिक मानसिक पीड़ा में उलझे किसानों ने गांव-गांव घूम कर लोगों का जन समर्थन हासिल करने के साथ-साथ पोस्टर बैनर इत्यादि के जरिए लोगों का ज्यादा से ज्यादा संख्या में उक्त अवसर पर पहुंचने का आह्वान किया है। किसानों में सरकार और सड़क विभाग से जुड़े अधिकारियों के साथ-साथ क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के प्रति भी जबरदस्त आक्रोश है।

साभार-जनचौक।


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