July 24, 2024 |

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पिता की हॉबी के अनुसार हुए बेटे, एक पहलवान, दूसरा डॉक्टर, तीसरा कवि

Sachchi Baten

जमालपुर ब्लॉक के मनई गांव के तीन भाइयों ने कमाया भारत में नाम

-करईल मिट्टी में खेलकर पहलवान बने श्रीपति पहलवान, काशी के पंडा अखाड़ा में थे सर्वश्रेष्ठ

-डॉ. रामसूरत सिंह राबर्ट्सगंज में गरीबों की सेवा को बनाया लक्ष्य

-कवि सुखनंदन सिंह लोकगीत विधा के बन गए गुरु

राजेश पटेल, जमालपुर (सच्ची बातें)। बरसात के मौसम में जब जिस गांव में पैदल जाने तक का रास्ता नहीं था, वहां की करईल मिट्टी ने तीन विभूतियों को जन्म दिया। बाद में इन तीनों विभूतियों ने अपने-अपने क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति हासिल की। इन तीनों विभूतियों में एक पहलवान, दूसरा डॉक्टर तथा तीसरे कवि थे।

कहानी विस्तार से

मिर्जापुर जिला के जमालपुर ब्लॉक में मनई गांव है। इस गांव के पूरब चंदौली जिला की सीमा है। इस गांव में बेचू सिंह बहुत ही सामाजिक व्यक्ति थे। जवानी में अखाड़े के शौकीन थे। उस समय एक बेटा पैदा हुआ। उसका नाम श्रीपति सिंह रखा गया। बाद में यही श्रीपति सिंह राष्ट्रीय स्तर के पहलवान बने। कुछ वर्षों बाद आर्युवेदिक दवा देने का काम शुरू किया। उस समय जो बेटा हुआ, उसका नाम रामसूरत सिंह रखा गया। बाद में रामसूरत सिंह प्रख्यात चिकित्सक बने। इन्होंने राबर्ट्सगंज में रहकर वहां आदिवासियों व गरीबों की सेवा शुरू कर दी।

अधेड़ उम्र तक बेचू सिंह का रुझान अध्यात्म की तरफ हो गया। भजन-कीर्तन, रामायण गाने लगे। इस दौरान पैदा बेटे का नाम सुखनंदन सिंह रखा गया। जो बाद में चलकर लोकगीत के प्रख्यात कवि बने। बिरहा जगत में उनका नाम आज भी लोग बहुत ही सम्मान के साथ लेते हैं।

 

फिलहाल इस लेख में बात सिर्फ श्रीपति सिंह पहलवान की

श्रीपति सिंह राष्ट्रीय स्तर के पहलवान कभी नहीं बन पाते, यदि उनके पिता बेचू सिंह का साथ न मिलता। बेचू सिंह भी जवानी के दिनों में पहलवानी करते थे। उन्होंने बेटे श्रीपति सिंह में भी अच्छा पहलवान बनने के लक्षण देखे। बेटे की रुचि भी इसमें ज्यादा थी। चूंकि पहलवानी के दाव से बेचू सिंह खुद वाकिफ थे, सो अखाड़े में प्रशिक्षण शुरू कर दिया। यहां-वहां, जहां-जहां कुश्ती प्रतियोगिताओं में खुद लेकर जाते। जीतने पर शाबाशी देते थे। कुश्ती में सामने जो भी आया, उसे चित किया।

श्रीपति सिंह का जन्म 20 मार्च 1920 को हुआ था।। खुद के शौक तथा पिता की प्रेरणा से किशोरावस्था पार करते-करते उनकी गिनती बड़े पहलवानों में होने लगी। इसी दौरान काशी के नामी पंडा जी अखाड़ा में मंगल राय के सानिध्य में आए। वहीं से देश व प्रदेश में ख्याति हासिल की। पहलवान दारा सिंह से भी इनकी खूब बनती थी। गामा पहलवान के परिवार इमाम बख्श व मोलू से भी गहरी मित्रता थी।

भदावल गांव के किसान रमेश सिंह ने बताया कि श्रीपति पहलवान ने एक बार बताया था कि दारा सिंह ने उनको फिल्मी दुनिया में जाने की सलाह दी। कहा कि सिर्फ हामी भरो, सारी व्यवस्था खुद कर देंगे। श्रीपति सिंह इस पर राजी नहीं हुए।

गामा पहलवान के परिवार के इमाम बख्श की सलाह पर ही श्रीपति सिंह ने चाय पीनी शुरू कर दी। वाकया इस प्रकार है- मुम्बई के ताज होटल में इमाम बख्श ने चाय मंगाई थी। उसेे नहीं पिया तो इमाम बख्श ने पूछ लिया कि आपकी थकान कैसे मिटती है। फिर उन्होंने सलाह दी कि दिन में कम से कम दो बार सुबह-शाम चाय पी लिया करिए। तभी से चाय पीनी शुरू की। वह उस समय भी चीनी के घोर विरोधी थे। आंवला व बथुआ का साग सीजन में बहुत खाते थे। अपने भोजन की थाली से चावल का परित्याग कर दिया था। वह शुद्ध देसी घी अपने साथ लेकर चलते थे।

श्रीपति सिंह पहली बार जमालपुर के पास सिकंदरपुर गांव में आयोजित एक बड़ी कुश्ती के माध्यम से बड़े पहलवान के रूप में सामने आए। वर्ष 1958 के आसपास इसका आयोजन क्षेत्र के कुश्ती के शौकीनों ने किया था। इसमें उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के उस समय के सभी बड़े पहलवानों ने शिरकत की थी। गुंगई, साधो, मंगला राय सरीखे पहलवान भी इसमें शामिल थे। अपने वर्ग की कुश्ती में सर्वश्रेष्ठ खिताब हासिल करने पर क्षेत्र के लोगों ने चांदी की गदा देकर नागरिक अभिनंदन किया था तथा मिर्जापुर केशरी की उपाधि से नवाजा।

देसी गाय के दूध का महत्व

गांव से निकलकर जब राष्ट्रीय फलक पर पहुंचे तो उनकी मुलाकात भी बड़े पहलवानों से होने लगी। इसी दौरान उनको गाय के दूध के महत्व की भी जानकारी मिली। अपने इस ज्ञान को वह लोगों से साझा भी करते थे।

पिड़खिड़ के हरवंश सिंह ने बताया कि पहलवान श्रीपति सिंह ने एक बार चर्चा के दौरान कहा था कि मंगला राय के सानिध्य में गाय के दूध के महत्व को समझा। वहां पर शाम को प्रतिदिन गाय का एक लीटर दूध पहलवानों को दिया जाता था। चाहे कहीं से भी लाना पड़े। पंडा अखाड़ा में रहने के दौरान जो दिनचर्या उन्होंने अपनाई, उसे हमेशा कायम रखा। परिणाम यह कि वह जीवन भर बीमार नहीं पड़े। सर्दी-जुकाम भी नहीं हुआ। भैंस का दूध पहलवानों के लिए फायदेमंद नहीं होता। यह उनको पंडा अखाड़ा में ही बताया गया। महसूस भी हुआ।

श्रीपति पहलवान के भानजे बहुआर निवासी अवधेश सिंह ने बताया कि अंतिम समय में बिस्तर पर गिरने के पहले वह नियमित व्यायाम करते थे। पहलवानी के समय तो 10-10 हजार उठक-बैठक करते थे। पहलवानी से संन्यास लेने के बाद भी शारीरिक श्रम को जारी रखा। प्रतिदिन उठक-बैठक, सपाटा के अलावा खेत में फावड़े से खुदाई करने लगते थे। चारा मशीन से पशुओं का चारा काटने लगते थे। बागवानी भी जमकर करते थे। वह हर संभव कोशिश करते थे कि उनका जीवन पर्यावरण के नजदीक रहे।

वह पहलवानी के साथ सामाजिक कार्यो में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे। बनारस में पटेल स्मारक के निर्माण में भी इनका सहयोग रहा। यही कारण है कि आज उनके न रहने पर भी क्षेत्र केे लोग उनका नाम काफी आदर के साथ लेते हैं और इलाके का गौरव बताते हैं। पूर्व सांसद बालकुमार पटेल ने भी सिटी क्लब मिर्जापुर में पटेल जयंती के अवसर पर सम्मानित किया था। जब 23 जनवरी 2010 को श्रीपति पहलवान का निधन हुआ तो यह दुखद खबर आकाशवाणी के समाचार बुलेटिन में भी प्रसारित की गई थी।

पहलवान के भाई डॉ. रामसूरत सिंह व कवि सुखनंदन सिंह के बारे में फिर कभी…

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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